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09 अगस्त 2010

बार काउंसिल चाहता है देश की अदालतों में अंग्रेजी में हो काम

अगर बार कौंसिल आफ इंडिया के सुझावों को स्वीकृति मिल गई तो वकालत के पेशे में भारी बदलाव आ सकता है। कुछ वर्षों बाद तहसीलों और कचहरियों में भी वकील अंग्रेजी में बहस करते नजर आएंगे। वकालत के पेशे से क्षेत्रीय भाषा का महत्व खत्म हो जाएगा,लोग अपनी मातृभाषा को भूल जाएंगे। पांच वर्षीय कानून की प़ढ़ाई ही मान्य होगी। बार कौंसिल में पंजीकरण के लिए प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करना जरूरी होगा।

यह सब करना चाहते हैं बार कौंसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष और महान्यायवादी गोपाल सुब्रमण्यम। इसी वर्ष के पांच दिसंबर से बार में पंजीकरण के लिए प्रवेश परीक्षा की घोषणा कर देने के बाद गोपाल सुब्रमण्यम ने अभी हाल में जो दस सूत्रीय सुझाव दिए हैं, उसके अनुसार विधि स्नातक बनने के लिए पांच वर्षीय पाठ्यक्रम ही मान्य होगा, वह भी अंग्रेजी माध्यम से। उनका मानना है कि पांच वर्षीय पाठ्यक्रम से ही विधि के क्षेत्र में योग्य अधिवक्ता तैयार किए जा सकते हैं जो २१वीं शताब्दी की चुनौतियों को स्वीकार कर सकने में सक्षम होंगे। नए सुझावों के अनुसार पूरे देश में सत्र २०११-२०१२ से विधि की प़ढ़ाई के लिए प्रवेश परीक्षा में एकरूपता रहेगी। इसके लिए जो भी आवश्यक परिवर्तन पाठ्यक्रम से लेकर शैक्षिक स्तर कर करने हैं, वे सब १५ दिसंबर तक पूरे हो जाने चाहिए । इन परिवर्तनों का मकसद विधि के क्षेत्र में गंभीरता पैदा करना और कुकुरमुत्तों की तरह उग आए कॉलेजों को बंद करना है। इस देश में करीब ११ लाख अधिवक्ता पंजी़क़ृत हैं। हर साल करीब ६० हजार नए विधि स्नातक ७०० कालेजों से निकलते हैं। उत्तर प्रदेश बार कौंसिल में करीब ढाई लाख अधिवक्ता पंजीकृत हैं। हर साल करीब दस हजार ब़ढ़ते हैं।

नई व्यवस्था लागू होने से एक तो पंजीकृत होने वाले अधिवक्ताओं की संख्या में जबरदस्त कमी आएगी। दूसरा यह कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अदालतों में एक ही भाषा बोली जाएगी । कौंसिल के पूर्व अध्यक्ष रहे वीसी मिश्र बीसीआई के अंग्रेजी थोपने के निर्देश को मूर्खतापूर्ण करार देते हुए कहते हैं कि यह प्रस्ताव सिर्फ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट तक ही सीमित रहे तो ठीक है। ९५ प्रतिशत वकील तहसीलों और कचहरियों में प्रैक्टिस करते हैं । इस निर्देश की पुनः समीक्षा करने की जरूरत है। कांग्रेस के विधि प्रकोष्ठ के अध्यक्ष उमेश नारायण शर्मा बीसीआई के इस निर्देशों को सही मानते हुए कहते हैं कि हमें अपनी नई पी़ढ़ी को बैल गा़ड़ी युग से बाहर निकालना ही होगा(नई दुनिया,दिल्ली,9.8.2010)।

1 टिप्पणी:

  1. जैसा आप ने लिखा है वैसा कुछ नहीं है। बार कौंसिल ऑफ इंडिया का सुझाव है कि लॉ स्कूलों में मीडियम ऑफ इंस्ट्रक्शन्स केवल अंग्रेजी होना चाहिए। यह भी सुझाव नहीं दिया है कि परीक्षा का माध्यम केवल अंग्रेजी होना चाहिए। आज यह हालत है कि देश के सभी कानून अंग्रेजी में हैं और उन की व्याख्या के लिए अंग्रेजी पाठ ही मान्य है। इस कारण से यदि मीडियम ऑफ इंस्ट्रक्शन्स अंग्रेजी होता है उस में क्या गलत है। निश्चित रूप से किसी भी अन्य भाषा के माध्यम से कानून को व्याख्यायित कर पाना दुष्कर है। यदि ऐसा किया भी जाता है तो वह त्रुटिपूर्ण होगा। हाँ विद्यार्थी किसी भी अन्य भाषा में अपनी परीक्षा दे सकेगा। यदि पूरे देश के कानून हिन्दी में बनने लगें तो फिर पूरे देश में हिन्दी माध्यम हो सकता है। पर क्या यह निकट भविष्य में संभव है?

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