विभिन्न भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की उठ रही लगातार मांगों के बीच सोमवार को संसद में गढ़वाली और कुमाऊंनी की भी आवाज उठी। गढ़वाल के लोकसभा सदस्य सतपाल महाराज ने इन दोनों भाषाओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और समृद्ध परंपरा का हवाला देते हुए मांग की कि इन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल कर राजभाषा का दर्जा दिया जाए। लोकसभा में शून्यकाल के दौरान सतपाल महाराज ने कहा कि 13-14वीं शताब्दी से पहले सहारनपुर व हिमाचल तक फैले गढ़वाल राज्य का राजकाज गढ़वाली भाषा में ही चलता था। देवप्रयाग मंदिर में महाराजा जगतपाल का दानपत्र लेख, देवलगढ़ में अजयपाल का 15वीं शताब्दी का लेख समेत कई शिलालेखों में गढ़वाली भाषा के प्राचीनतम होने का प्रमाण मिला है। उन्होंने कहा कि 10वीं शताब्दी गढ़वाली भाषा का लिखित साहित्य उपलब्ध है। उन्होंने दावा किया कि गढ़वाली एवं कुमाऊंनी भाषा भारत की प्रचीनतम भाषाओं में एक हैं, लेकिन इन भाषाओं को आज तक वह सम्मान नहीं मिला जो दूसरी भाषाओं को प्राप्त है। उन्होंने मांग की इन दोनों भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल कर राजभाषा का दर्जा दिया जाए तथा इनके प्रचार-प्रसार के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। हिंदी, उर्दू, पंजाबी अकादमी की तर्ज पर इन भाषाओं के लिए भी अकादमियां स्थापित की जाएं ताकि इन भाषाओं पर शोध कार्य किया जा सके तथा अन्य संपर्क माध्यमों जैसे फिल्म, नाटक, संगीत आदि के संस्थान स्थापित किए जा सकें। सरकार की ओर से सतपाल महाराज को तो कोई आश्वासन नहीं मिला, लेकिन कुछ सांसदों की ओर से भोजपुरी को राजभाषा का दर्जा दिए जाने की मांग जरूर उठी। भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को सरकार पहले ही संसद में मान चुकी है। बहरहाल अब तक उसे दर्जा नहीं मिल पाया है(दैनिक जागरण,दिल्ली,3.8.2010)।
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