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09 अगस्त 2010

उच्च शिक्षा से युवाओं की बेरुखी घातक

दाखिले का दौर लगभग खत्म हो चुका है। इस दौरान एक खेदजनक स्थिति यह दिखी है कि युवाओ का रुझान उच्च शिक्षा की ओर कमतर होता जा रहा है। जो युवा इस क्षेत्र में आ भी रहे है उसके पीछे उनकी अलग तरह की मजबूरी दिख रही है। दरअसल शिक्षा में रोजगार की अहमियत सबसे बड़ी चीज बना दी गयी है, इसलिए युवाओ का लगाव प्रोफेशनल कोर्स की ओर बढ़ा है और उन्हे उच्च शिक्षा अप्रासंगिक सी लगने लगी है। यह शिक्षा जगत के लिए एक खतरनाक संकेत है और आने वाले 15- 20 सालो मे इस ओर संतुलित रवैया नही अपनाया गया तो समाज एकांगी व्यवस्था और विकृति की ओर बढ़ेगा। हमारे सोचने-समझने के रवैये मे इस कदर परिवर्तन आएगा कि हम सामाजिक प्राणी न रह कर मशीनी मानव मे तब्दील हो जाएंगे। आखिर शिक्षा के कुछ सामाजिक सरोकार भी है। हम उसे सिर्फ और सिर्फ व्यापार के साथ नही जोड़ सकते। आज जिस धड़ल्ले से प्रोफेशनल कोर्स के इंस्टीट्यूट खुल रहे है और बारहवी पास करते ही उसमे दाखिला लेने को छात्र-छात्राएं मचल पड़े है, उससे शिक्षा के सही उद्देश्य को हासिल करना दूर की कौड़ी लग रही है। मेरी समझ है कि छात्राे के लिए जनरल साइंस, इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र आदि विषयो की भूमिका कही से भी प्रोफेशनल कोसो से अधिक है। हां! इसे रोजगारपरक बनाये जाने की थोड़ी जरूरत है। फिर एक चीज और समझने की जरूरत है कि कई

प्रोफेशनल कोर्स ऐसे है जहां अच्छी सफलता के लिए जरूरी है कि आप उच्च शिक्षा मे निपुण हो। एक उदाहरण जर्नलिज्म का लिया जा सकता है। जाहिर है इस क्षेत्र मे उनकी जड़ंे ज्यादा मजबूत होती है जिन्होने उच्च शिक्षा हासिल की हो। इसी तरह के कई उदाहरण साइंस के विषयो से जुड़ाव रखने वाले प्रोफेशनल कोसरे मे भी है। कहने का मतलब साफ है कि उच्च शिक्षा कई प्रोफेशनल शिक्षा की भी आधारभूमि है और बगैर इसे हासिल किये आप उच्च कोटि के मानव संसाधन मैनेजर नही हो सकते। सरकार और शिक्षण संस्थाओ को चाहिए कि वे उच्च शिक्षा को रोजगार से जोड़ें और इससे जुड़ी नयी सम्भावनाएं तलाशें। समाज भी इस तथ्य को समझे कि आनन-फानन मे पढ़ाई कर आप कुछ ही दिनो मे पैसे कमाने लायक जरूर हो सकते है लेकिन यह समाज और इकानॉमी के ठोस विकास को खोखला ही करेगा। जहां तक रोजगार की बात है, यह साफ है कि प्रोफेशनल कोर्स बेहतर स्थिति मे है लेकिन महज इसी कारण उच्च शिक्षा को इग्नोर नही किया जा सकता। यहां एक आदर्श स्थिति यह हो सकती है कि सारे प्रोफेशनल कोर्स को उच्च शिक्षा से जोड़ा जाए। जैसे इतिहास व पुरातत्वशास्त्र के अध्ययन को हम टूरिज्म व कल्चर के साथ जोड़ दे। अंग्रेजी के उच्च भाषाई ान को कॉल सेटर तथा विदेशी भाषाओ के ान को टूरिज्म व होटल इंडस्ट्ी के जॉब से जोड़ दे। अभी के हालात मे लोगो का रुझान साफ तौर पर प्रोफेशनल कोर्स की ओर घातक स्तर पर पहुंच गया है। कुछ क्षेत्राे को छोड़ दे तो महज कोर्स करना ही नौकरी की गारंटी है, ऐसा नही। फिर दूसरी तरफ उच्च शिक्षा के क्षेत्र मे साधनो का अभाव है। कई जगह ठीक विश्वविद्यालय नही है तो कई जगह टीचर नही। लाइब्रेरी, लैब आदि बुनियादी सुविधाएं अधिकतर जगह से नदारद है। ऐसे मे छात्रों को सही उच्च शिक्षा मिल रही है, यह भी संदेहजनक है। वैसे सरकार ने कई जगह केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने और उच्च शिक्षा से जुड़े कई
अन्य सुविधाएं देने की घोषणा कर इस ओर ध्यान देने की इच्छाशक्ति जता कर इस ओर से सकारात्मक संदेश दिया है लेकिन आगे देखना है कि इस पर कितना अमल किया जाता है। (दिल्ली विवि में डीन ऑफ स्टूडेंट वेलफेयर प्रो. विज से आशुतोष प्रताप सिंह की बातचीत पर आधारित आलेख,राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,9.8.2010)

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