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08 अगस्त 2010

भाषा-समाज

'एक भाषा हुआ करती है’। जी हां, साहित्य हो या आम समाज उसकी एक भाषा हुआ करती है। उसकी अपनी भाषा, जिसमे उसकी संस्कृति पिरोयी होती है। उसकी संस्कृति का अस्तित्व पसरा होता है। इसी संस्कृति के अस्तित्व मे उसकी (साहिय और समाज की) अपनी एक पहचान छिपी होती है जिस पर उसका स्वयं का भी अस्तित्व टिका होता है। पर यदि किसी देश या समाज की अपनी भाषा का यह अस्तित्व खतरे मे पड़ जाए तो यह निश्चित है कि वह समाज या देश पतन की ओर गिरने लगता है। इसलिए साहित्य के अस्तित्व का संरक्षण बहुत जरूरी है और साहित्य संरक्षण तभी संभव हो सकता है, जब किसी समाज या देश की अपनी भाषा सुरक्षित और संरक्षित होगी। संस्कृति संरक्षण के बगैर किसी देश की अस्मिता सुरक्षित नही रह सकती और जहां की संस्कृति सुरक्षित नही रहती वहां की जनता किसी न किसी रूप मे पराधीन अवश्य रहती है। इसलिए भाषा के अस्तित्व को पहले बचाना है। उदय प्रकाश यही सरोकार जताते है, अपने आलोच्य काव्य संग्रह ‘एक भाषा हुआ करती है’ में। हालांकि यह चिन्ता समाज की भाषा से अधिक साहित्य, खासकर कविता और उसकी भाषा के अस्तित्व की है। कवि चाहता है कि प्रत्येक जन हर जगह जीने की कला सीख जाए। जहां साहित्य या उसकी भाषा पर कोई विपरीत प्रभाव पड़ता देखे तो वह उसके खिलाफ संघर्ष भी कर सके। लेकिन यह भाषा आम जन की होनी चाहिए जिसमे कुरीतियो, असमानताओ तथा सामाजिक बुराइयो के विरुद्ध भी आवाज हो। उसकी तकलीफों का जिक्र हो। असामाजिक तत्वो के खिलाफ बगावत करने की सामथ्र्य हो। लुटते-घुटते संस्कारों का नई पीढ़ी मे पुनर्संचरण हो। इसी चिंतन से कवि की यह काव्य यात्रा भी शुरू होती है और उनकी कलम इसके अनुभवों को पकड़ती है-‘देखो कोई नही सोया है इस चन्द्रमा जैसे शरीर से लिपट कर/एक छोटे से संकरे कमरे मे/जागता हुआ अकेला आधी रात/सिर्फ एक अपमानित आमा जो छोड़ना चाहती है धीरे-धीरे अपना केंचुल’ इन पंक्तियो मे एक चित्र विम्बित होता है, उस समाज का जो अपने बुजुर्गो को अलग-थलग किसी कोने के कमरे मे घृणित-सा अकेला छोड़ देता है और वह बुजुर्ग अपने प्राणो को त्यागने की कामना भरा प्रय} करता है। इस तरह की घटनाएं आम समाज की आम घटनाएं है। यह हमारे समयसमाज की विडम्बना नही तो और क्या है? इससे इतर हम स्वतंत्रता का ढिंढोरा कितना भी पीट लें लेकिन मानसिक और ऐच्छिक गुलामी से हम अब भी नही छूट सके है। हमारी ही कमियो के कारण यह सब हो रहा है, जिसका खमियाजा हमारे सर्वहारा समाज को झेलना पड़ रहा है। आजकल गोरखधंधो को सफेद जामा पहनाया जाता है। नए-नए सब्ज बाग दिखाकर जश्न आदि के बहाने जहां एक अपराधी राज कर रहा है। हर तरह के ऐशो-आराम उसकी झोली मे पड़े है। वही दूसरी तरफ एक सज्जन व्यक्ति गरीबी मे तरह-तरह की यातनाएं झेल रहा है। इन पंक्तियो मे यह दृश्य बखूबी नजर आयेगा- ‘अफवाहें है ताकत और वैभव के अनगिनती माध्यमो की/उत्सव है हत्याओ और पापो को छिपाने के निमित्त। सच है कि हमारे ठेकेदार अपनी मातृभाषा के प्रति चिल्ला-चिल्लाकर जो झूठी संवेदना व्यक्त करते रहते है, लेकिन जामा विदेशी मानसिकता और भाषा का ही पहने हुए है। ऐसे मे भाषा और देश के उद्धार की कैसे आशा की जा सकती है। कोई आम आदमी जब अपनी मातृभाषा मे बोलता है तो उसे हीन दृष्टि से देखा जाता है। इस संग्रह के माध्यम से कवि ने अपनी जन सामान्य की भाषा को फिर से पुष्ट करने तथा उसकी अस्मिता बरकरार रखने की एक अपील भरा का प्रयास किया है। (किताबघर से प्रकाशित उदय प्रकाश की पुस्तक-एक भाषा हुआ करती है की पंडित प्रेम बरेलवी द्वारा समीक्षा,राष्ट्रीय सहारा,पटना,8.8.2010)

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