मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून के लिए स्कूलों में कितने अतिरिक्त शिक्षकों की जरूरत पडेगी। इस मामले में भी शिक्षा विभाग और टास्क फोर्स की गणनाएं भिन्न हो रही हैं। छात्र संख्या के आंकडे तो पहले से ही दोनों विभागों के अलग-अलग हैं।
शिक्षा विभाग जहां परम्परागत पद्धति के अनुसार राज्य के 75 हजार प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों के लिए ढाई लाख अतिरिक्त शिक्षकों की आवश्यकता बता रहा है, वहीं मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून लागू करने के लिए गठित टास्क फोर्स इससे कम शिक्षकों की आवश्यकता बता रही है।
पिछले दिनों जयपुर में हुई टास्क फोर्स की बैठक में शिक्षकों की जरूरत पर चर्चा की गई थी। टास्क फोर्स अनिवार्य शिक्षा कानून के मानदण्डों के अनुसार शिक्षकों की गणना कर रही है। इसके लिए 60, 90, 120 और इससे अधिक विद्यार्थियों वाले विद्यालयों को भी अलग-अलग छांट लिया गया है। इस तरह की गणना से अतिरिक्त शिक्षकों की जरूरत ढाई लाख से कम हो सकती है। हालांकि वर्तमान में किए गए समानीकरण में शिक्षकों के प्रबंधन के लिए जो मानदण्ड बनाए गए उनमें इस कानून का ध्यान नहीं रखा गया था। पर, अब अनिवार्य शिक्षा कानून के अनुसार ही मानदण्ड तय किए जा रहे हैं।
अनुपात 40 से ऊपर नहीं
अनिवार्य शिक्षा के लिए प्राथमिक विद्यालय में 60 छात्रों तक दो, 90 तक तीन, 120 तक चार शिक्षक देने हैं। छात्रों की संख्या 150 से ऊपर होने पर एक प्रधानाध्यापक और पांच शिक्षक तथा 200 से अधिक छात्रों पर छात्र-शिक्षक अनुपात किसी भी सूरत में 40 से ऊपर नहीं होना चाहिए। कक्षा छह से आठ तक के लिए विज्ञान-गणित, सामाजिक अध्ययन और भाषा के कुल तीन शिक्षक अनिवार्य रूप से होने चाहिए। इन कक्षाओं में 35 छात्रों पर एक शिक्षक होना चाहिए।
छात्र संख्या का पेच बाकी
सर्वशिक्षा अभियान और शिक्षा विभाग छात्रों की गणना भी अलग-अलग आधार पर करते रहे हैं। छात्रों की गणना में भी दोनों विभागों में हमेशा अंतर रहा है। शिक्षकों की संख्या छात्र संख्या के आधार पर ही तय होनी है। इस कारण दोनों विभागों की छात्र संख्या में एकरूपता लाने के सम्बन्ध में भी चर्चा की गई, लेकिन इस पर अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है(राजस्थान पत्रिका,बीकानेर,24.8.2010)।
जानकारी का आभार !!
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