विश्वविद्यालयों के शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों के बकाये वेतन भुगतान से संबंधित मामले की सुनवाई करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने कहा है कि विश्र्वविद्यालय स्वायत्तता प्राप्त संस्थान है,राज्य सरकार को इसमें अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अदालत ने सोमवार को मानव संसाधन विकास विभाग के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह से कहा कि जब भी शिक्षकों के बकाये वेतन को लेकर सवाल खड़ा होता है विश्वविद्यालयों का रटा-रटाया जवाब होता है कि सरकार आवंटन नहीं दे रही है। जबकि सरकार कहती है कि अवैध नियुक्तियों को लेकर ही सारा झमेला है। आखिर यह फुटबाल मैच कब तक चलता रहेगा। सभी गेंद को एक दूसरे की ओर फेंक देते हैं। सुनवाई के क्रम में सचिव कोर्ट में बुलवाये गये थे। न्यायाधीश नवनीति प्रसाद सिंह की पीठ ने बीएन मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा, बीआर अम्बेडकर विश्र्वविद्यालय-मुजफ्फरपुर, जेपी विश्र्वविद्यालय-छपरा एवं कामेश्र्वर सिंह संस्कृत विश्र्वविद्यालय के शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों के बकाये वेतन को लेकर सुनवाई की। अदालत जानना चाहती थी कि यूजीसी के पुनरीक्षित वेतनमान का लाभ शिक्षाकर्मियों को क्यों नहीं मिल पा रहा है। जबकि इन्हें 1 जनवरी 96 से 31 दिसम्बर 2005 तक का लाभ मिल जाना चाहिए था। अदालत ने 19 जुलाई को ही राज्य सरकार एवं विश्र्वविद्यालयों को 2 अगस्त तक शपथ पत्र दायर कर सभी बातों की जानकारी देने का निर्देश दिया था। अदालत ने राज्य सरकार, विश्र्वविद्यालय एवं कुलाधिपति को त्रिकोणीय फुटबाल मैच खेलने से मना करते हुए कहा कि 10 मई 1986 के पूर्व नियुक्त शिक्षकों के वेतन बकाये का निबटारा, जस्टिस अग्रवाल कमेटी की अनुशंसा के परिप्रेक्ष्य में किया जाए। मालूम हो कि ये सारी नियुक्तियां चतुर्थ चरण से पहले की हैं। सुनवाई में महाधिवक्ता पी.के. शाही ने कहा कि सारी गड़बड़ी अवैध नियुक्तियों को लेकर है परन्तु राज्य सरकार अब आनुपातिक नियुक्तियों के आधार पर सारे मसले का हल करेगी। इस पर अदालत ने मामले की अगली तिथि 30 अगस्त निर्धारित करते हुए संबंधित पक्षों को विश्र्वविद्यालय के 15 सौ करोड़ के बकाये का सर्वमान्य हल निकालने को कहा(दैनिक जागरण,पटना,10.8.2010)।
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