सरकारी विभागों में रुटीन कामकाज भी समय से नहीं हो रहे क्योंकि समूह ग और घ वर्ग के कर्मचारियों की संख्या कम है। आँकड़े बताते हैं कि बड़े-बड़े विभागों की स्थिति और भी खराब हैं जहाँ स्वीकृत पद में से 30-35 प्रतिशत पद रिक्त हैं। जानकारों का कहना है कि पिछले एक दशक से नियुक्तियाँ नहीं हुईं जबकि इस दौरान हर साल दोनों संवर्ग के कर्मचारी समय के हिसाब से रिटायर होते जा रहे हैं। नतीजा रुटीन के काम में भी काफी समय लग रहा है। आँकड़े बताते हैं कि मण्डी परिषद में अराजपत्रित पद मसलन तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के कुल 1428 पद हैं किन्तु 776 ही कर्मचारी हैं। इसी प्रकार मण्डी सचिवों के 315 स्वीकृत पदों में से मात्र 70 पद ही भरे हैं। आईटीआई अनुदेशकों के तीन हजार 423 स्वीकृत पदों में मात्र एक हजार 570 पद ही भरे हुए हैं। वहीं राजकीय पॉलिटेक्निक में 419 स्वीकृत पदों में से 310 पद ही भरे हैं। इसके अलावा विद्यालय निरीक्षक के ए़क हजार 577 स्वीकृत पदों में से ए़क हजार 100 पद ही भरे हुए हैं, जबकि स्वास्थ्य विभाग के प्रयोगशाला सहायक (ग्रामीण) के एक हजार 986 स्वीकृत पदों में से 649 पद खाली हैं। प्रदेश के कर्मचारी नेता इन सारी परिस्थितियों के लिए सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि सीधी और नियमित भर्ती न कर सरकार संविदा पर व सर्विस प्रोवाइडरों के माध्यम से नियुक्ति कर रही है जिसमे घपले हो रहे हैं। कर्मचारी नेता आरके निगम कहते हैं नियुक्ति सिर्फ पुलिस व शिक्षा विभाग में हुई है। शिक्षा विभाग में केवल शिक्षकों की नियुक्ति हुई है जबकि कृ षि, पंचायती राज, ग्राम्य विकास, लोक निर्माण तथा सिंचाई जैसे विभागों में 35 प्रतिशत तक तृतीय व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के पद रिक्त हैं। इन विभागों में पिछले कई सालों से कोई नियुक्ति नहीं हुई। इसका नतीजा दैनिक कामकाज तो प्रभावित हो ही रहे हैं आम और सामान्य तरीके की पत्रावलियों का निस्तारण भी नहीं हो पा रहा है। कर्मचारी नेता अजय सिंह कहते हैं कि रिक्त पद न भरे जाने से कर्मचारियों पर कार्य का भारी बोझ है(अजीत कुमार,हिंदुस्तान,लखनऊ,6.9.2010)।

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