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28 सितंबर 2010

रोजगार गारंटी कानून को कुंद कर रही है सरकार

भीषण बेरोजगारी और पलायन से त्रस्त ग्रामीण भारत में राहत का संदेश लेकर आए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी कानून (मनरेगा) को केंद्र सरकार कुंद कर रही है। मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूरों को न तो समय पर मजदूरी मिल रही है। जब मिल रही है रोज के सौ रुपए की जगह एक रुपया दिया जा रहा है। ऐसे में मजबूर हो कर मजदूर गांवों से पलायन कर रहे हैं। यह मनरेगा को कुंद करने के समान है।

सवाल यह है कि जिस मनरेगा का योगदान यूपीए को दोबारा सत्ता में पहुंचाने में अहम रहा है, उसी महत्वपूर्ण कानून की उपेक्षा करने का जोखिम क्या सरकार उठा सकती है। आज भी इस कानून के तहत पांच करोड़ लोगों को २००९-१० में काम मिला है। इसके बावजूद यह कानून कायदे से देशभर में लागू नहीं किया जा रहा है, अपवादस्वरूप तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश को छोड़कर। ये बातें शुक्रवार को देशभर में मनरेगा के क्रियान्वयन में हो रही दिक्कतों को सामने रखने के लिए बुलाए गए संवाददाता सम्मेलन में उभरी। इस संवाददाता सम्मेलन को सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहाकार परिषद (एनएसी) की सदस्य और मनरेगा पर राजस्थान में जमीनी काम कर रहीं अरुणा राय, अर्थशास्त्री और मनरेगा पर ग्रामीण विकास एवं रोजगार मंत्रालय की समिति के सदस्य ज्यां द्रेज, नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमेन की नेता एनी राजा और मनरेगा अभियान से जुड़ी रितिका खेड़ा ने संबोधित किया। इस मौके पर राजस्थान के टोंक जिले के गुरलिया गांव से आए तीन ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें सौ रुपए की जगह किस तरह से सिर्फ एक रुपए मजदूरी दी गई और इतने दिनों से इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के बावजूद कोई राहत नहीं मिली। उन्होंने साफ कहा कि एक रुपए की मजदूरी देकर सरकार ने साफ कर दिया है कि वह नहीं चाहती की हम इस योजना में काम करें। ज्यां द्रेज ने इस संदर्भ में दो-तीन महत्वपूर्ण सवाल उठाए। पहला यह कि भीषण महंगाई के दौर में, जब केंद्र और राज्य सरकारें अपने कर्मचारियों का वेतन बढ़ा रहे हैं, वहीं मनरेगा के मजदूरों का वेतन १०० रुपए पर ही स्थिर कर रखा है। दूसरे केंद्र सरकार का यह फैसला कि वह मनरेगा के मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी नहीं देगी, सीधे-सीधे उनके अधिकारों का हनन है। इस तरह से मनरेगा के मजदूरों को १०० रुपए प्रतिदिन से अधिक की मांग करने से रोक दिया है। उनसे जब पूछा कि उनकी नजर में इस समय मनरेगा के मजदूरों को कितनी मजदूरी मिलनी चाहिए तो ज्यां द्रेज ने कहा कम से कम १२५ रुपए प्रतिदिन। अरुणा राय का कहना था कि केंद्र सरकार पर इस समय विश्व बैंक का कड़ा दबाव है कि वह मनरेगा जैसी कल्याणकारी-अधिकारआधारित योजनाओं की जगह कैश हस्तांतरित करने पर जोर दें। ऐसे में इन कानूनों को किसी भी तरह से कमजोर बनाने की साजिश हो रही है जो जनदबाव से ही रोकी जा सकती है। मनरेगा के सामाजिक अंकेक्षण को भी पारदर्शी नहीं बनाया जा रहा है, इससे सामाजिक संगठनों को बाहर करके गलत संदेश गया है। एनी राजा ने मंत्रालय की मनरेगा समिति में जिस तरह के सदस्यों को रखा गया है, उसी पर सवाल उठाया। उन्होंने बताया कि उनके संगठन ने मनरेगा पर १६ राज्यों का जो सर्वेक्षण किया है उसमें सामने आया कि ६६ फीसदी लोगों को काम नहीं मिल रहा तथा ६० फीसदी लोगों को काम करने के बाद महीनों बाद मजदूरी मिल रही है। रितिका खेड़ा और आंध्र प्रदेश से आए सत्याबाबू बोस ने बताया कि तमिलनाडु और आंध्र में चूंकि राज्य सरकार और सामाजिक संगठनों का नेटवर्क अच्छा है इसलिए मनरेगा में भ्रष्टाचार उतना नहीं है(नई दुनिया,दिल्ली,28.9.2010)।

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