आईपी विश्वविद्यालय के तहत दो मेडिकल कॉलेज में दाखिला देने के लिए लगभग सौ छात्रों का दोबारा टेस्ट लेने को गलत करार देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार को भी सीटें बढ़ाकर भ्रम पैदा नहीं करना चाहिए। हालांकि कोर्ट ने इन छात्रों के भविष्य को देखते हुए इनका दाखिला रद करने से इंकार कर दिया और कहा कि इन्होंने दूसरे टेस्ट में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) द्वारा तय प्रतिशत लाया था। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा व जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने कहा कि इन छात्रों के लिए दोबारा टेस्ट लेना गलत था। लेकिन तथ्यों से यह बात सामने आई कि पूरे मामले में बहुत भ्रम था। विवि को दोबारा टेस्ट लेने के बजाए इस संबंध में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया से सलाह लेना चाहिए था। विवि को एमसीआई एक्ट 1956 के तहत ही काम करना चाहिए था। एमसीआई भी स्थिति स्पष्ट करता तो इस तरह का भ्रम पैदा न होता। केंद्र सरकार को भी सीटें बढ़ाकर इनको स्टेट कोटा के तहत लाकर भ्रम पैदा करने से बचना चाहिए था। कोर्ट उम्मीद करती है कि बच्चों के भविष्य व कॅरियर के संबंध में निर्णय करते समय केंद्र सरकार, विवि, एमसीआई व दिल्ली सरकार मिलकर काम करेगी। गुरु गोविंद इंद्रप्रस्थ विवि (आईपी विवि) ने पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल कोर्स की 120 सीट के लिए दो अप्रैल को कॉमन इंट्रेंस टेस्ट (सीट) लिया था। यह टेस्ट सफदरजंग स्थित वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज व पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, राम मनोहर लोहिया अस्पताल के लिए लिया गया था, जिसमें 130 छात्रों ने टेस्ट दिया था, लेकिन इनमें से सिर्फ 24 का दाखिला हुआ। कुछ छात्रों ने इस टेस्ट में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। हाईकोर्ट की एक सदस्यीय खंडपीठ के आदेश के बाद विवि ने बची सीटों के लिए फिर से टेस्ट ले लिया और छात्रों को दाखिला दे दिया। दोबारा से टेस्ट लेने को गलत करार देते हुए कुछ छात्रों ने दो सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष याचिका दायर की थी(दैनिक जागरण,दि्ल्ली,7.9.2010)।
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