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29 सितंबर 2010

आईएएस अफसरों को नहीं भा रही उत्तर प्रदेश की आबोहवा

भारतीय सिविल सेवा के अफसरों को अब उत्तर प्रदेश की आबो-हवा रास नहीं आ रही है । हर साल कोई न कोई अधिकारी सरकार के कामकाज से क्षुब्ध होकर इस महत्वपूर्ण नौकरी से निजात बेहतर समझता है।

बीते चार वर्षों में तकरीबन आठ आईएएस अधिकारियों ने देश की इस सर्वोच्च सेवा को अलविदा कह दिया है। दिलचस्प यह है कि इनमें से अधिकांश आईएएस अधिकारी कामकाज में उत्कृष्ट कोटि के हैं । इन्होंने विश्व बैंक सरीखे तमाम वैश्विक तैनातियों के दौरान नाम भी कमाया है । हाल-फिलहाल इसी तरह के आईएएस अधिकारी राजू शर्मा ने आईएएस की नौकरी से छुट्टी पा ली । १९८२ बैच के राजू शर्मा २३ दिसंबर २००२ से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर थे । हाल ही में वे उत्तर प्रदेश लौटे हैं। दो महीने के उनके सूबे में तैनाती के दौरान तीन तबादले हुए । कहा जाता है कि तबादलों की मार से तंग आकर उन्होंने नौकरी से तौबा करना बेहतर समझा । श्री शर्मा का कार्यकाल २०१९ तक था । नियम के मुताबिक पचास साल से कम उम्र का कोई आईएएस अधिकारी इस्तीफा देता है तो उसे स्वीकृति के लिए केंद्र को भेजा जाता है । इससे अधिक उम्र के अधिकारियों का इस्तीफा राज्य सरकार भी स्वीकार कर सकती है । श्री शर्मा ने अभी जून में ही पचास साल पूरे किए हैं । इसलिए उनकी दिक्कतें और दुश्वारियां दिल्ली तक नहीं जा पाएंगी । यह बात दीगर है कि मुलायम राज में इस्तीफा देने वाले अनिल कुमार-द्वितीय को इसका लाभ मिला था । उन्होंने तत्कालीन सरकार से नाराजगी के चलते कानपुर में तैनाती के दौरान इस्तीफा दे दिया था । अनिल कुमार की जन्मतिथि १९ मई १९६६ थी । नतीजतन, उनका इस्तीफा राज्य सरकार स्वीकार नहीं कर सकती थी । राज्य ने केंद्र को भी भेजने की हिम्मत नहंी जुटाई । वह पड़ा रह गया और सरकार बदलने के साथ ही अनिल कुमार फिर नौकरी में वापस आ गए । पर ऐसे भी तमाम लोग हैं जिन्होंने जल्दी से जल्दी निजात पाना बेहतर समझा । इनमें ८१ बैच के परमेश्वरन अय्‌यर भी हैं । इन्होंने भी वर्ष २००८ के शुヒआती दिनों में तबादलों की मार से तंग आकर ही इस्तीफा दे दिया । केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से वापस लौटे परमेश्वरन को इतनी बार इधर-उधर किया गया कि उन्होंने विश्व बैंक की सेवा करना बेहतर समझा(नई दुनिया,दिल्ली,28.9.2010 में लखनऊ से योगेश मिश्र की रिपोर्ट)।

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