केंद्रीय पंचायतीराज मंत्री डॉ. सी.पी. जोशी ने एमबीए शिक्षितों को पंचायत प्रबंधन सौंपने की योजना घोषित की है।
वे इंजीनियर, एकाउंटेंटों, कृषि प्रसार अधिकारियों भी नियुक्त करना चाहते हैं। उन्होंने अपने लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र भीलवाड़ा में बतौर प्रयोग यह काम शुरू भी किया है। राजस्थान में ऐसे करीब 40 हजार डिग्रीधारी युवाओं को नियुक्त किया जाएगा। ये अधिकारी पंचायतों की सभी योजनाओं का प्रबंधन, मॉनीटरिंग और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन का कामकाज देखेंगे। इसके लिए केंद्र राज्य सरकारों से एमओयू करेगा। इन नियुक्तियों पर होने वाला 80 प्रतिशत खर्च भारत सरकार करेगी और 20 प्रतिशत खर्च राज्य सरकार वहन करेगी। यह एमओयू आठ वर्षो तक का होगा।
देशभर की करीब 2 लाख, 40 हजार पंचायतों पर यह व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव है। पंचायतीराज के पुराने रचनाकारों, आयोजना विशेषज्ञों और राजस्थान के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि आज तो पंचायतीराज संस्थाओं को सौंपे जाने वाले पांच विभागों के अधिकारी और कर्मचारी ही वहां जाने से जी चुरा रहे हैं। ‘हाई-फाई’ एमबीए डिग्रीधारी ग्रामों के विकास प्रबंधन में कैसे रुचि दिखाएंगे? हकीकत तो यह है कि राजस्थान में प्रशासन गांवों की ओर अभियान के तहत मंत्री एवं जिला कलेक्टर के एक रात गांवों में रुकने के निर्देश पर ही उनके पसीने छूट गए थे तो फिर एमबीए डिग्रीधारी युवा बारह मास कैसे बिताएंगे?
एमबीए का मतलब है व्यावसायिक प्रबंधन, मार्केटिंग-प्रबंधन, बाजार-प्रबंधन में महारथ हासिल किया हुआ डिग्रीधारी। उनका स्वप्न और कार्य संस्कृति की सोच भी ‘मल्टीनेशनल कंपनियां’, बड़े राष्ट्रीय उद्योग-धंधों और व्यावसायिक समूहों में अच्छे ‘पैकेज’ के साथ साधन-सुविधा हासिल करना होता है। झुलसा देने वाली धूप, आंधी, मूसलाधार बरसात के थपेड़ों और शहरी मनोरंजन के साधनों के अभाव में क्या वे प्रारंभ से पनपाया गया स्वप्न बिसरा देंगे? ग्रामों एवं पंचायतों के प्रति समर्पित भाव से कार्य करने वाला कोई बिरला ही एमबीए डिग्रीधारी मिलेगा। पंचायती राज विषय के विशेषज्ञों का मानना है कि एमबीए की डिग्री देने वाले लब्धप्रतिष्ठ संस्थानों के युवक पंचायतों की सेवा स्वीकार करने में रुचि नहीं दिखाएंगे, बल्कि छोटे-छोटे बरसाती एमबीए कॉलेजों के डिग्रीधारी जब तक उन्हें कोई अच्छा जॉब नहीं मिलेगा, तब तक वे दस हजारी तनख्वाह पर काम करते रहेंगे।
पंचायतीराज विषय विशेषज्ञों की यह भी राय है कि एमबीए डिग्रीधारियों को ग्रामीण प्रशासन प्रबंधन, ग्राम विकास प्रबंधन का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। राजस्थान में तो आईएएस की भी पहली नियुक्ति बीडीओ और एसडीओ पद पर करने की परंपरा है, ताकि वे ग्राम विकास, भू-राजस्व, भूमि सुधार, सिलिंग, ग्रामीण समस्याओं, पंचायतीराज संस्थाओं के क्रिया-कलापों को बारीक से सीख लें। राजस्थान के आयोजना विशेषज्ञ, पंचायतीराज संस्थाओं के कार्य में निरंतर जुटे, समर्पित राजनेताओं और वरिष्ठ गांधीवादी सोच वालों की यह राय है कि राज्य सरकार पंच-सरपंच को ही इतना प्रशिक्षित करें कि वे अपने पंचायत क्षेत्र के विकास में जी-जान से जुट सकें । इसके लिए वे उन्हें समर्पित, निष्ठावान स्टाफ भी सुलभ कराएं।
ऐसे कृषि, सिंचाई, पेयजल, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, लेखों के युवा अधिकारी एवं कर्मचारी उन्हें हर राज्य में सुलभ हो जाएंग। यदि प्रशिक्षित पंचों एवं समर्पित स्टाफ के बीच सहभागिता की परंपरा विकसित की गई तो पंचायतीराज व्यवस्था ग्रामों के विकास की दिशा में जड़ें जमाने लगेगी। आज के वैश्वीकरण, महानगरीकरण और नगरीकरण के दौर में गांव-शहर की तरफ पलायन कर रहा है। एमबीए डिग्रीधारियों का मनमानस ग्रामोन्मुख करना धारा के तीव्र प्रवाह को मोड़ने जैसा है। क्या केंद्रीय पंचायतीराज एवं ग्रामीण विकास मंत्री डॉ.सी.पी. जोशी इस धारा को मोड़ सकेंगे?
(श्याम आचार्य,दैनिक भास्कर,जयपुर,29.9.2010)
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