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02 सितंबर 2010

अब नए सिरे से मशविरा करेंगे सिब्बल

विपक्ष के कड़े विरोध और सत्तापक्ष के भी तल्ख तेवरों के चलते राज्य सभा में मंगलवार को शैक्षिक न्यायाधिकरण विधेयक को पारित कराने में झटका खाने के बाद सरकार की आंख खुल गई है। अब वह इस विधेयक पर पक्षकारों से नए सिरे से मशविरा करेगी। जिन्हें नहीं समझा सकी, उन्हें समझा पाई तो विधेयक को मौजूदा स्वरूप में ही शीतकालीन सत्र में फिर से लाएगी अन्यथा, प्रावधानों में बदलाव भी संभव है। लोक सभा में पारित होने और राज्य सभा में चर्चा के बाद इस विधेयक को टालने से हुई सरकार की फजीहत मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल पर भारी पड़ रही है। लिहाजा, इस विधेयक के प्रावधानों पर अब वह संबंधित पक्षकारों से फिर मशविरा करना चाहते हैं। मंगलवार को राज्य सभा में विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्तापक्ष ने भी सिब्बल पर इस बात के लिए निशाना साधा कि उन्होंने विधेयक पर संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों को बिल्कुल दरकिनार कर दिया। समिति ने निजी उच्च शिक्षण संस्थानों से मशविरा न किए जाने, राज्य शैक्षिक न्यायाधिकरण में तीन के बजाय पांच सदस्य रखे जाने, जिन राज्यों में पहले से ऐसे न्यायाधिकरण हैं उनके क्या अनुभव हैं और नए न्यायाधिकरण को बनाने की स्थिति में पहले से कार्यरत न्यायाधिकरणों की भूमिका क्या होगी, जैसे सवाल उठाए थे। समिति ने न्यायाधिकरण में नौकरशाही का ज्यादा दखल होने की भी बात कही थी। समिति ने सवाल उठाए थे कि विधेयक में अनुचित कार्यो को परिभाषित नहीं किया गया है। विधेयक में राष्ट्रीय व राज्य न्यायाधिकरण के अध्यक्ष के लिए 55 वर्ष की आयु सीमा रखी गई है। संसदीय समिति ने अध्यक्ष के लिए इस आयु सीमा की बंदिश हटाने की सिफारिश की थी। समिति ने उन सुझावों व सिफारिशों के बारे में मंत्रालय से टिप्पणी चाही थी, जिसे विधेयक में शामिल नहीं किया, लेकिन मंत्रालय ने सबको दरकिनार कर विधेयक को मूल मसौदे के साथ ही संसद में पेश कर दिया। राज्य सभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान सदस्यों ने इन्हीं बातों का सहारा लेकर सरकार पर विधेयक को जल्दबाजी में लाने का आरोप लगाया। न्यायाधिकरण के कामकाज का ताल्लुक उच्च शिक्षा के एक अन्य विधेयक से है, जो दाखिलों में कैपिटेशन फीस, महंगे और गलत जानकारी देने वाले ब्रोशर बेचने जैसे अनुचित कार्यो पर रोक और सजा के प्रावधान के लिए प्रस्तावित हैं। राज्य सभा में सदस्यों ने यही एतराज जताया कि जब एक अन्य विधेयक का ताल्लुक इससे है, तो दोनों विधेयक साथ आने चाहिए थे। सदस्यों की आपत्ति देखते हुए सरकार ने विधेयक वापस ले लिया(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,2.9.2010)।

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