दिल्ली हाईकोर्ट ने सशस्त्र बलों और अर्द्धसैनिक बलों के मेडिकल बोर्डो के गठन की नीति पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया है। बोर्ड के गठन की यह प्रक्रिया अब हाईकोर्ट की निगरानी के दायरे के अंतर्गत आ गई है। कोर्ट ने इसके तहत उम्मीदवारों को दिए जाने वाले मेडिकल क्लीयरेंस प्रक्रिया के बारे में कहा है कि यह सर्टीफिकेट अक्सर उन चिकित्सकों ने दिया है, जिनके पास कोई विशेषज्ञता नहीं थी।
जस्टिस गीता मित्तल और जेआर मिधा की खंडपीठ ने चार दशक पुरानी इस नीति पर फिर से विचार करने के लिए कहा है। खंडपीठ ने कहा कि समीक्षा या अपीलीय मेडिकल बोर्ड में सिविल सर्जन या ऐसे लोग शामिल हैं, जिनके पास मेडिकल क्षेत्र से संबंधित विशेषज्ञता नहीं है। गौरतलब है कि कोर्ट ने एक विशेषज्ञ इकाई की रिपोर्ट के आधार पर सशस्त्र बलों और अर्धसैनिक बलों को यह आदेश दिया है।
खंडपीठ ने कहा कि हमने पाया है कि हमारे आदेशों के तहत गठित बोर्ड के विशेषज्ञों के विचार उस समीक्षा या अपीलीय बोर्ड से भिन्न हैं, जिसमें कोई विशेषज्ञ शामिल नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि रेस्पांडेंट और अधिकारियों को मेडिकल बोर्ड के गठन की उनकी नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए, जो कि चार दशक पुरानी हो चुकी है। कोर्ट ने छह महीने में कार्यवाही रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।
खंडपीठ ने इस बात पर भी नाराजगी जताई है कि अधिकारियों ने ऐसे डाक्टरों के सर्टीफिकेट स्वीकार कर लिए, जिनके पास संबंधित क्षेत्र में विशेषज्ञता नहीं है। उन्हांेने कहा कि हम यह समझने में असमर्थ हैं कि कैसे कोई डाक्टर जो दिए गए मेडिकल सर्टीफिकेट में मौजूद स्थिति के बारे में विशेषज्ञता या प्रशिक्षण नहीं रखता है, उस क्षेत्र से संबंधित सर्टीफिकेट दे सकता है।
यह खेदजनक बात है कि अधिकारियों ने बिना किसी विशेषज्ञ की राय लिए ऐसे सर्टीफिकेट को स्वीकार कर लिया। कोर्ट क मलेश कुमार कमल की याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल सीआरपीसी में सहायक कमांडेंट के पद के लिए अयोग्य घोषित किया गया था, लेकिन बाद में उसे चयनित कर लिया गया था, जब कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उसने सिविल असपताल के विशेषज्ञों से फिटनेस का सर्टीफिकेट लिया था(दैनिक भास्कर,दिल्ली,13.9.2010)।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।