वैज्ञानिक अनुसंधान के मामले में वैसे तो भारत चीन से बहुत पीछे चल रहा है, लेकिन बहुत जल्द वह फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के समकक्ष पहुंच सकता है। शुरुआती सुस्ती के बाद भारत में रिसर्च ने रफ्तार पकड़ ली है। विज्ञान की दुनिया में सम्मानजनक स्थान हासिल करने में अभी काफी वक्त लगेगा, लेकिन भारतीय प्रयोगशालाओं के रिसर्च आंकड़े बता रहे हैं कि भारतीय विज्ञान अब लंबी छलांग लगाने को तैयार है। देश के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार रिसर्च पेपरों के विश्लेषण के बाद विशेषज्ञों का विचार है कि देश में वैज्ञानिक अनुसंधान काफी तेज हुआ है, लेकिन चीन की तुलना में हम अभी काफी पीछे हैं। लगभग 20 वर्ष पहले चीन हमारे बराबर था। वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किए जाने वाले रिसर्च पेपरों के आधार पर देश में चल रही वैज्ञानिक गतिविधियों का आकलन किया जाता है। भारत से प्रकाशित होने वाले रिसर्च पेपरों की संख्या 1998 से 2008 के दौरान दोगुनी से अधिक हुई है। 1998 में यह संख्या 16,000 थी, जो 2008 में बढ़कर 39,000 हो गई। चीन ने 1998 में 18,000 रिसर्च पेपर प्रकाशित किए थे, लेकिन 2008 में यह संख्या 1,12,000 हो गई। रिसर्च वर्क में इस रिकॉर्डतोड़ वृद्धि के बाद चीन दुनिया की एक बड़ी विज्ञान-शक्ति बन गया है और लोग उसे अब काफी गंभीरता से देखने लगे हैं। भारत में 2008 के बाद से अनुसंधान कार्यो में तेजी आई है। अनुसंधान और विकास के लिए धनराशि लगातार बढ़ रही है। 2009 में भारत ने वैज्ञानिक अनुसंधान पर 28,400 करोड़ रुपये खर्च किए थे। यह राशि उससे पिछले वर्ष की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक थी। इस साल जनवरी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विज्ञान के लिए कुछ वर्षो तक बजट बढ़ाते रहने का आश्वासन भी दिया था। विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च शिक्षा में व्यय बढ़ाकर भारत साइंस की दुनिया में अपनी छाप छोड़ सकता है। किसी देश में विज्ञान का स्तर कितना ऊंचा है, उसका अंदाजा वैज्ञानिक रिसर्च पेपरों को मिले साइटाइशेन से भी लगाया जा सकता है। हाल ही में किए गए एक विश्लेषण से पता चलता है कि भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा 1998 और 2007 के बीच प्रकाशित किए गए 775 पेपरों का विभिन्न वैज्ञानिक मंचों पर इस साल के आरंभ तक करीब 100 बार उल्लेख किया जा चुका है। इसकी तुलना में चीन के 2250 पेपरों को साइटेशन मिले थे। वैज्ञानिकों के योगदान का अनुमान उन्हें मिले साइटेशन से लगाया जाता है। इन पेपरों को प्रकाशित करने वाली विज्ञान पत्रिकाओं की रैंकिंग इंपैक्ट फैक्टर के आधार पर की जाती है। इंपैक्ट फैक्टर की गणना वैज्ञानिकों केरिसर्च पेपरों और उन्हें मिले कुल साइटेशन के आधार पर की जाती है। हालांकि वैज्ञानिक समुदाय का एक हिस्सा इस तरीके से संतुष्ट नहीं है, लेकिन फिलहाल इससे बेहतर व्यवस्था नहीं होने के कारण इंपैक्ट फैक्टर से ही पत्रिका की स्टैंडिंग आंकी जाती है। एक अध्ययन से पता चलता है कि भारतीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं ने पिछले 12 वर्षो के दौरान अपने इंपैक्ट फैक्टर में काफी सुधार किया है। जर्नल ऑफ बायोसाइंस का इंपैक्ट फैक्टर 1997 में 0.435 था, जो 2009 में बढ़कर 1.956 तक पहुंच गया। इसी तरह इसी अवधि में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च के इंपैक्ट फैक्टर में भी सुधार हुआ है, लेकिन दुनिया की जो प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिकाएं हैं उनके इंपैक्ट फैक्टर बहुत ज्यादा हैं। उदाहरण के तौर पर नेचर पत्रिका का इंपैक्ट फैक्टर 34.68 है। हाल के समय में भारत की सभी प्रमुख विज्ञान पत्रिकाओं के इंपैक्ट फैक्टर में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। सिर्फ भारतीय पत्रिकाओं के आधार पर ही भारतीय विज्ञान की सही तस्वीर का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि अधिकांश रिसर्च पेपर विदेशी पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। इसके बावजूद भारतीय पत्रिकाओं के महत्व को कम नहीं किया जा सकता। ये पत्रिकाएं अधिकांश भारतीय वैज्ञानिकों को अपने और अपने सहयोगियों के अनुसंधान कार्यो के उचित मूल्यांकन का एक अच्छा मंच प्रदान करती हैं। अब भारतीय वैज्ञानिकों को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए(मुकुल व्यास,दैनिक जागरण,28.9.2010)।
मेरेिये तो ये पूरी जानकारी नई है।अगर भारत से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाये तो इसी शीर्ष पर पहुँचने मे समय नही लगेगा। देश का आधे से अधिक बजट तो नेता लोग ही डकार जाते हैं। फिर भी उमीद पर दुनिया कायम है।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद।