आपको कितनी पेंशन चाहिए यह आप तय कर सकते हैं। प्रोविडेंट फंड के करीब साढ़े चार करोड़ सदस्यों के लिए नई पेंशन स्कीम लागू करने की तैयारी की जा रही है। पेंशन स्कीम पर विचार करने के लिए बनाई विशेषज्ञों की कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौप दी है। इस पर ईपीएफओ की बोर्ड में विचार होने जा रहा है। नई स्कीम मौजूदा इंप्लाइज पेंशन स्कीम 1995 की जगह लेगी। रिपोर्ट में कई ऐसे प्रावधान हैं जिससे सामाजिक सुरक्षा और मजबूत होगी। कर्मचारी की मौत या विकलांगता को भी इसमें कवर कि या जाएगा। कई देशों में लागू पेंशन स्कीम का अध्ययन करने के बाद रिपोर्ट को तैयार किया गया है। इसे प्रोविडेंट फंड-सह-पेंशन एन्युटी स्कीम कहा जाएगा। पेंशन में कंट्रीब्यूशन के लिए लिए सीमा खत्म कर दी गई है। नियोक्ता या फिर सदस्य बगैर ईपीएफओ की मंजूरी किसी सीमा से ज्यादा इसमें पैसा जमा करा सकते हैं। लोगों को ज्यादा पेंशन मिल सके इसके लिए कंट्रीब्यूशन को मौजूदा 9.49 प्रतिशत से बढ़ाकर 14 प्रतिशत करने का प्रावधान किया जा रहा है। पेंशन फंड मे इकट्ठे पैसे से एन्युटी खरीदी जाएगी और उसके अनुरूप पेंशन मिलेगी। हर व्यक्ति के लिए खाता अलग-अलग होंगे अपने पेंशन खाते को कभी भी देखा जा सकता है। मौजूदा स्कीम के कुछ फायदे भी कम किए जा सकते हैं। स्कीम में शामिल होने के बाद कोई भी सदस्य समय से पहले पैसा नहीं निकाल सकता है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि पेंशन पूल में ज्यादा राशि इकट्ठी हो सके । इसके अलावा, परिवार के बाहर नामनी पेंशन को भी खत्म करने का प्रावधान हो रहा है। पेंशन मिलने में यदि देरी होती है तो सदस्य को इतनी अवधि का ईपीएफओ की तरफ से ब्याज भी दिया जाएगा(रामकृष्ण उपाध्याय,हिंदुस्तान,चंडीगढ़,7.9.2010)।
उधर,इसी विषय पर दैनिक जागरण के दिल्ली संस्करण की ख़बर कहती है कि कर्मचारी पेंशन योजना यानी ईपीएस में पीएफ और पेंशन के लिए अलग-अलग दो खाते बनाने की मांग की गई है। केंद्र सरकार की ओर से गठित विशेषज्ञ समूह ने ईपीएस में पेंशन के प्रबंधन के तौर-तरीकों पर सवाल उठाया है। समूह ने साफ कहा कि अलग खाते बनाकर ही पेंशन स्कीम में बढ़ रहे घाटे की चुनौती से निपटा जा सकता है। मौजूदा स्कीम के अंतर्गत पेंशन फंड से ही पेंशन दी जाती है। इसके रखरखाव की जिम्मेदारी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के पास है। वर्ष 1995 में शुरू हुई ईपीएस से संगठित क्षेत्र के करीब 4.45 करोड़ कर्मचारी जुड़े हैं। पिछले कई साल से यह सरकार की चिंता का सबब बन गई है। वजह यह है कि 31 मार्च, 2006 तक इसका घाटा 22 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। पूर्व अतिरिक्त श्रम सचिव एसके श्रीवास्तव की अध्यक्षता में गठित किए गए विशेषज्ञ समूह का कहना है कि ईपीएस की समस्याएं दूर करने के लिए इसकी जगह नई प्रॉविडेंट फंड-कम-एन्युटी स्कीम को लागू करने की जरूरत है। समूह ने प्रस्ताव दिया है कि हर सदस्य के लिए अलग-अलग दो खाते बनाने की जरूरत है। इनमें पहला पीएफ खाता (पीएफए) और दूसरा एन्युटी कंट्रीब्यूशन या पेंशन खाता (एसीए) होगा। समिति ने कर्मचारियों की ओर से किए जाने वाले योगदान को बढ़ाने की भी सिफारिश की है। अभी ईपीएस में कर्मचारी का योगदान 8.33 प्रतिशत होता है, जबकि सरकार इसमें 1.16 प्रतिशत का योगदान करती है। इस तरह यह रकम कर्मचारी की सैलरी का 9.49 प्रतिशत हो जाती है। प्रस्तावित स्कीम में इसे बढ़ाकर कर्मचारी के वेतन का 13.5 प्रतिशत करने का सुझाव दिया गया है। इस हिस्से में 2 फीसदी की सरकारी सब्सिडी भी शामिल होगी। ईपीएस की सबसे ज्यादा आलोचना इससे मिलने वाली बेहद कम पेंशन आय की वजह से होती है। वर्ष 1952 में जब ईपीएफओ ने परिचालन शुरू किया था, उस वक्त इसमें फैमिली पेंशन बेनिफिट नहीं था। वर्ष 1971 में इसमें फैमिली पेंशन की शुरुआत हुई। इसके तहत सेवा के दौरान अगर कर्मचारी की मौत हो जाती है तो परिवार के सदस्यों को पेंशन मिलने लगती है। इस पेंशन को पाने का हकदार वही व्यक्ति या उसका परिवार हो सकता है, जिसने कम से कम 10 साल की नौकरी पूरी कर ली हो। वर्ष 2008 में श्रम मंत्रालय ने ईपीएस के कुछ फायदों में कटौती कर स्कीम की देनदारी में कमी की थी, लेकिन स्कीम के तहत हो रहे नुकसान को इससे भी नियंत्रित नहीं किया जा सका। ट्रेड यूनियनें और संसदीय समिति मांग कर चुकी हैं कि केंद्र हटाई गई सुविधाओं को बहाल कर एक हजार रुपये प्रति माह की पेंशन को हर हाल में सुनिश्चित करे। विशेषज्ञ समूह ने माना है कि स्कीम के तहत अभी भले ही निश्चित पेंशन राशि मिल रही हो, लेकिन इसका प्रबंधन बेहद गैर-पारदर्शी तरीके से होता है। समूह की रिपोर्ट पर ईपीएफओ के निर्णायक निकाय यानी केंद्रीय न्यासी बोर्ड की 15 सितंबर को होने वाली बैठक में चर्चा होगी।
उधर,इसी विषय पर दैनिक जागरण के दिल्ली संस्करण की ख़बर कहती है कि कर्मचारी पेंशन योजना यानी ईपीएस में पीएफ और पेंशन के लिए अलग-अलग दो खाते बनाने की मांग की गई है। केंद्र सरकार की ओर से गठित विशेषज्ञ समूह ने ईपीएस में पेंशन के प्रबंधन के तौर-तरीकों पर सवाल उठाया है। समूह ने साफ कहा कि अलग खाते बनाकर ही पेंशन स्कीम में बढ़ रहे घाटे की चुनौती से निपटा जा सकता है। मौजूदा स्कीम के अंतर्गत पेंशन फंड से ही पेंशन दी जाती है। इसके रखरखाव की जिम्मेदारी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के पास है। वर्ष 1995 में शुरू हुई ईपीएस से संगठित क्षेत्र के करीब 4.45 करोड़ कर्मचारी जुड़े हैं। पिछले कई साल से यह सरकार की चिंता का सबब बन गई है। वजह यह है कि 31 मार्च, 2006 तक इसका घाटा 22 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। पूर्व अतिरिक्त श्रम सचिव एसके श्रीवास्तव की अध्यक्षता में गठित किए गए विशेषज्ञ समूह का कहना है कि ईपीएस की समस्याएं दूर करने के लिए इसकी जगह नई प्रॉविडेंट फंड-कम-एन्युटी स्कीम को लागू करने की जरूरत है। समूह ने प्रस्ताव दिया है कि हर सदस्य के लिए अलग-अलग दो खाते बनाने की जरूरत है। इनमें पहला पीएफ खाता (पीएफए) और दूसरा एन्युटी कंट्रीब्यूशन या पेंशन खाता (एसीए) होगा। समिति ने कर्मचारियों की ओर से किए जाने वाले योगदान को बढ़ाने की भी सिफारिश की है। अभी ईपीएस में कर्मचारी का योगदान 8.33 प्रतिशत होता है, जबकि सरकार इसमें 1.16 प्रतिशत का योगदान करती है। इस तरह यह रकम कर्मचारी की सैलरी का 9.49 प्रतिशत हो जाती है। प्रस्तावित स्कीम में इसे बढ़ाकर कर्मचारी के वेतन का 13.5 प्रतिशत करने का सुझाव दिया गया है। इस हिस्से में 2 फीसदी की सरकारी सब्सिडी भी शामिल होगी। ईपीएस की सबसे ज्यादा आलोचना इससे मिलने वाली बेहद कम पेंशन आय की वजह से होती है। वर्ष 1952 में जब ईपीएफओ ने परिचालन शुरू किया था, उस वक्त इसमें फैमिली पेंशन बेनिफिट नहीं था। वर्ष 1971 में इसमें फैमिली पेंशन की शुरुआत हुई। इसके तहत सेवा के दौरान अगर कर्मचारी की मौत हो जाती है तो परिवार के सदस्यों को पेंशन मिलने लगती है। इस पेंशन को पाने का हकदार वही व्यक्ति या उसका परिवार हो सकता है, जिसने कम से कम 10 साल की नौकरी पूरी कर ली हो। वर्ष 2008 में श्रम मंत्रालय ने ईपीएस के कुछ फायदों में कटौती कर स्कीम की देनदारी में कमी की थी, लेकिन स्कीम के तहत हो रहे नुकसान को इससे भी नियंत्रित नहीं किया जा सका। ट्रेड यूनियनें और संसदीय समिति मांग कर चुकी हैं कि केंद्र हटाई गई सुविधाओं को बहाल कर एक हजार रुपये प्रति माह की पेंशन को हर हाल में सुनिश्चित करे। विशेषज्ञ समूह ने माना है कि स्कीम के तहत अभी भले ही निश्चित पेंशन राशि मिल रही हो, लेकिन इसका प्रबंधन बेहद गैर-पारदर्शी तरीके से होता है। समूह की रिपोर्ट पर ईपीएफओ के निर्णायक निकाय यानी केंद्रीय न्यासी बोर्ड की 15 सितंबर को होने वाली बैठक में चर्चा होगी।
बहुत अच्छी जनकारी प्राप्त हुई।
जवाब देंहटाएंहरीश गुप्त की लघुकथा इज़्ज़त, “मनोज” पर, ... पढिए...ना!