जमीनी हकीकत चाहे कुछ भी हो लेकिन कागजों में जरूर अल्पसंख्यकों की तस्वीर बदल रही है। उनकी बेहतरी के लिए तय कार्यक्रमों के नतीजे उम्मीद से भी बेहतर आ रहे हैं। अलबत्ता अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में आवासीय सुविधाओं को बढ़ाने की रफ्तार धीमी है। उर्दू शिक्षकों की कमी है। लिहाजा, इन दोनों मामलों पर खास फोकस किया जाएगा। अल्पसंख्यकों की तरक्की की यह तस्वीर प्रधानमंत्री के 15 सूत्रीय कार्यक्रम की हालिया समीक्षा के बाद उभरी है। केंद्रीय कैबिनेट उससे संतुष्ट है। आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं। अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में 3465 प्राइमरी स्कूल बनने थे। इस साल 31 मार्च तक 3237 (93 प्रतिशत) बन चुके थे। इसी तरह उच्च प्राथमिक स्तर पर लक्ष्य 1348 का था जिसमें से 1220 (91 प्रतिशत) बन गए। ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों को पढ़ने के लिए 28 आवासीय कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय बनने थे। उनमें 27 बन गये। इतना ही नहीं, अल्पसंख्यकों में गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) रहने वाले 60,7837 परिवारों को इंदिरा आवास दिए जाने थे। 31 मार्च तक उनमें से 54,3413 (89.40 प्रतिशत) को आवास मिल गया था। दूसरी तरफ बीपीएल से अलग बाकी अल्पसंख्यकों के मामले में इंदिरा आवास उपलब्ध कराने की प्रगति धीमी रही है। उसी के चलते बीते वित्तीय वर्ष में इंदिरा आवास में अल्पसंख्यकों के लिए तय बजट का सिर्फ 68 प्रतिशत ही खर्च हो पाया। इसी तरह अल्पसंख्यकों के मामले में स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना में लगभग 65 प्रतिशत ही सफलता मिल सकी है। आंगनबाड़ी केंद्रों के निर्माण में सिर्फ 63 प्रतिशत नतीजे आ सके हैं। अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में जहां 25 प्रतिशत आबादी उर्दू बोलती है, वहां के स्कूलों में उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति होनी है। उन अंशकालिक शिक्षकों को एक हजार रुपये प्रतिमाह का मानदेय दिया जाना है। सूत्र बताते हैं कि राज्य सरकारें इस ओर वाजिब तवज्जो नहीं दे रही हैं। लिहाजा अब उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति के मामले में तेजी लाने पर जोर दिया जाएगा(राजकेश्वर सिंह,दैनिक जागरण,दिल्ली,7.9.2010)।
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