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27 सितंबर 2010

यूपीःविश्वविद्यालयों की फीस बढ़ेगी!

विश्वविद्यालय व कालेजों की आमदनी बढ़ाने के लिए शासन को तीन मॉडल सुझाये गए हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए शासन द्वारा कानपुर के छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हर्ष कुमार सहगल की अध्यक्षता में गठित कुलपतियों की समिति ने यह नुस्खे सुझाये हैं। शासन को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में समिति ने पहले मॉडल के तहत विश्वविद्यालयों और कालेजों की ट्यूशन फीस, परीक्षा शुल्क व अन्य फीस बढ़ाने की वकालत की है। ट्यूशन फीस में बढ़ोत्तरी इस हिसाब से करने का सुझाव दिया गया है जिससे विश्वविद्यालयों और कालेजों में शिक्षकों, प्रशासनिक व सहायक स्टाफ के वेतन तथा आवश्यक ऑपरेशनल व रखरखाव संबंधी खर्चों की उससे भरपाई हो सके और इसके लिए गैर-योजनागत बजट की जरूरत न पड़े। प्रदेश में उच्च शिक्षा से जुड़े विश्वविद्यालय, राजकीय, सहायता प्राप्त तथा स्ववित्तपोषित कालेजों में समान पाठ्यक्रमों के लिए समान ट्यूशन फीस लेने का सुझाव दिया गया है। सभी कोर्स में विद्यार्थियों की मौजूदा संख्या में एक-तिहाई का इजाफा करने की भी सिफारिश की गई है। समिति ने संस्तुति की है कि गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों से ताल्लुक रखने वाले विद्यार्थियों और फीस माफी के पात्र छात्रों को फीस की प्रतिपूर्ति शासन द्वारा सीधे की जानी चाहिए। ऐसे छात्रों को शिक्षा में उत्कृष्टता के लिए प्रेरित करने के लिए समिति ने एक फार्मूला भी सुझाया है। समिति के मुताबिक इन श्रेणियों के वे छात्र जिन्हें 70 फीसदी तक अंक मिलते हैं उनकी कुल फीस के रिफंड के अलावा उन्हें उसका 50 प्रतिशत प्रोत्साहन राशि के रूप में दिया जाना चाहिए। 60 फीसदी या उससे अधिक, लेकिन 70 प्रतिशत से कम अंक पाने वाले विद्यार्थियों को फीस रिफंड के अलावा उसका 25 प्रतिशत बतौर प्रोत्साहन राशि दिया जाना चाहिए। 40 फीसदी या उससे अधिक लेकिन 60 प्रतिशत से कम अंक पाने वालों को सिर्फ फीस रिफंड की सुविधा देने का सुझाव दिया गया है, जबकि इससे कम अंक पाने वाले छात्रों को रिफंड की कोई सुविधा न देने की सिफारिश की गई है। समिति का मानना है कि इससे सरकारी कालेजों में प्रवेश के लिए मारामारी और स्ववित्तपोषित कालेजों की सीटें खाली रह जाने की समस्याओं से निपटने में मदद मिलेगी। आमदनी बढ़ाने के दूसरे मॉडल के तहत समिति ने सहायता प्राप्त और स्ववित्तपोषित संस्थानों में विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए अलग-अलग ट्यूशन फीस वसूलने की सिफारिश करते हुए दोनों के लिए शुल्क की दरें निर्धारित की हैं। वहीं तीसरे मॉडल के तहत शिक्षण संस्थानों से अपेक्षा की गई है कि वे दूसरे मॉडल से शुरुआत करते हुए एक निश्चित समय सीमा में पहले मॉडल पर अमल करने लगें। समिति ने विश्वविद्यालयों व उनसे संबद्ध कालेजों में परीक्षा व अन्य शुल्कों को भी बढ़ाने की संस्तुति की है। समिति ने यह भी कहा कि कालेज कुल फीस का पांच प्रतिशत सम्बंधित विश्वविद्यालय को प्रशासनिक व्यय के रूप में दें। विश्वविद्यालयों को विद्यार्थियों से सालाना पचास रुपये वार्षिक खेल शुल्क के मद में लेने का सुझाव दिया है। साथ ही समिति ने विश्वविद्यालयों के कालेजों को सम्बद्धता जारी करने के लिए सम्बद्धता शुल्क भी निर्धारित किया है(राजीव दीक्षित,दैनिक जागरण,लखनऊ,27.9.2010)।

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