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23 सितंबर 2010

डीयू का डिप्लोमा इन कंफ्लिक्ट ट्रान्सफॉर्मेशन एंड पीस बिल्डिंग पाठ्यक्रम

देश से लेकर विदेश तक जगह-जगह हो रहे संघर्षों में शांति कायम रखना एक चुनौती-भरा काम है। इन संघर्षों के मूल स्वरूप की पहचान कैसे की जाए और अहिंसात्मक तरीके से समाज को विकास के पथ पर किस रूप में लाया जाए, इसकी कला सिखाने और समझ पैदा करने काम कंफ्लिक्ट ट्रांसफॉर्मेशन एंड पीस बिल्डिंग यानी संघर्ष विभेद और शांति स्थापना का कोर्स बखूबी करता है। पिछले पांच साल से लेडी श्रीराम में यह कोर्स युवाओं में खासा लोकप्रिय हो रहा है। दो साल के इस डिप्लोमा कोर्स में एनजीओ कार्यकर्ता, मीडियाकर्मी, सैन्यकर्मी और सोशल वर्कर्स जैसे तरह-तरह के लोग आ रहे हैं।

कोर्स का मकसद

एलएसआर में इस कोर्स की कोऑर्डिनेटर अंकिता पांडेय कहती हैं, इसका उद्देश्य संघर्षात्मक स्थितियों को पहचानना, समझना और उन्हें मैनेज करने की जानकारी देना है। देश में आज संघर्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर का है। मसलन भारत पाक समस्या। भारत चीन या नेपाल के साथ जुड़ी समस्या। दोनों के बीच संघर्ष किस तरह का है। इसकी वजह क्या है। इसके इतिहास और वर्तमान के बारे में छात्रों को जानकारी दी जाती है। पूरी दुनिया में, चाहे वह दक्षिणी एशिया के संघर्ष हों या अन्य देशों में, इनके स्वरूप की पहचान पाठय़क्रम के जरिए कराई जाती है। कंफ्लिक्ट ट्रांसफॉर्मेशन से जुड़े क्षेत्र, जिनमें संघर्ष की रोकथाम, संघर्ष प्रबंधन और शांति स्थापना शामिल हैं, के सैद्धांतिक पहलुओं के बारे में समझ पैदा की जाती है। उनमें सामाजिक संघर्ष को डील करने मसलन संवाद, सहजता, मध्यस्थता और विचार-विमर्श जैसी चीजों की क्षमता विकसित की जाती है। संघर्षों के बीच उनमें शांति स्थापना की प्रक्रिया शुरू करने की कला के बारे में गहराई से जानकारी दी जाती है। इनके बीच ऐसा रचनात्मक माहौल बनाने की प्रेरणा दी जाती है, जिसमें युवा सामाजिक परिवर्तन लाएं। कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक जिस तरह के संघर्ष हैं, उनमें बदलाव लाने में युवा सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।

पाठय़क्रम की रूपरेखा

दो साल के अंदर छात्रों को चार पेपर पढ़ने होते हैं। इनमें संघर्ष का विश्लेषण, उसका बदलाव, स्किल बिल्डिंग, संवाद, मध्यस्थता और सुलह आदि विषय हैं। हिंसा, अहिंसा और संघर्षात्मक परिवर्तन है। छात्रों को मानवाधिकार, जेंडर, न्याय और मेल-मिलाप का पाठ पढ़ाया जाता है। दूसरे साल में थ्योरी के एक पेपर के अलावा छात्रों को एक्शन रिसर्च, प्रोजेक्ट और दो माह की इंटर्नशिप भी कराई जाती है। यह किसी एनजीओ, मीडिया या शिक्षण संस्थान के साथ होता है।

दाखिले की प्रक्रिया

लड़कियों के इस कॉलेज में लड़के और लड़कियां, दोनों के लिए प्रवेश का दरवाजा खुला है। दाखिले की न्यूनतम योग्यता 60 फीसदी अंकों के साथ 12वीं पास है। आवेदन के साथ ही छात्रों से कोर्स में दाखिला लेने के मकसद के बारे में एक लेख मांगा जाता है। इस लेख के बाद छात्रों की शॉर्टलिस्टिंग करके उन्हें साक्षात्कार के लिए बुलाया जाता है। इसके आधार पर अंतिम लिस्ट निकाली जाती है।

करियर कहां

इसे करने के बाद प्लेसमेंट जैसी व्यवस्था तो कॉलेज में नहीं है, लेकिन एनजीओ में सर्वे के काम में ऐसे छात्रों को काम करने का मौका मिलता है। वह किसी सामाजिक संस्थान या ग्रासरूट लेवल की संस्था में रिसर्च असिस्टेंटशिप में सहायक के रूप में काम कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर की संस्थाएं भी ऐसे छात्रों को अपने यहां काम करने का मौका मुहैया कराती हैं। छात्र आगे चल कर रिसर्च वर्क से भी जुड़ सकते हैं(आनंद कुमार,हिंदुस्तान,दिल्ली,21.9.2010)

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