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06 सितंबर 2010

जर्मनी और हिंदी

जर्मनी में कभी बेहद लोकप्रिय रही विदेशी भाषा, संस्कृत की लोकप्रियता कम हुई है। इसके बावजूद अच्छी बात यह है कि हिंदी को लेकर अब भी जर्मन लोगों की दिलचस्पी बरकरार है। हिंदी को लेकर लोगों की दिलचस्पी में बॉलीवुड फिल्मों का बड़ा योगदान है। बर्लिन स्थित भारतीय दूतावास के प्रथम सचिव (सूचना और परियोजना) आशुतोष अग्रवाल ने बताया कि जर्मनी के हाइडेलबर्ग, लोवर सेक्सोनी के लाइपजिग, बर्लिन के हम्बोलडिट और बॉन विश्वविद्यालय में कई दशक से हिंदी और संस्कृत पढ़ाई जा रही है, लेकिन संस्कृत पढ़ने वालों की संख्या में पिछले कुछ सालों में कमी आई है। उन्होंने कहा कि भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के सहयोग से यहां हिंदी और संस्कृत पढ़ाई जाती है और शिक्षक भी परिषद के सहयोग से ही नियुक्त किए जाते हैं। फिलहाल, ऐसे चार शिक्षक विभिन्न विश्वविद्यालयों में नियुक्त हैं। अग्रवाल ने कहा कि पहले एक सत्र में संस्कृत पढ़ने वालों की संख्या 100 से अधिक हुआ करती थी, लेकिन पिछले लगातार दो सत्र से ऐसे विद्यार्थियों की संख्या कुल मिलाकर 40 से ज्यादा नहीं है। बॉन विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हेंज वर्नर वेसलर बताते हैं, जर्मनी में संस्कृत और हिंदी पढ़ने की पुरानी परंपरा रही है। असल में यहां संस्कृत के प्रति दिलचस्पी तब शुरू हुई जब वर्ष 1800 में विलियम जोस ने कालीदास की अभिज्ञानम शाकंुतलम का जर्मन भाषा में अनुवाद किया। उन्होंने कहा कि तभी से संस्कृत को भारतीय ज्ञानग्रंथों की गहराइयों में झांकने का जरिया माना जाने लगा। उनका कहना है कि हिंदी को अब साहित्य के बजाय बॉलीवुड फिल्मों और योगशास्त्रों को समझने का भी एक जरिया माना जाता है। जर्मन रेडियो डॉयचे वेले के हिंदी कार्यक्रम की चीफ ड्यूटी एडिटर प्रिया एसेलबॉर्न बताती हैं कि संस्कृत को लेकर दिलचस्पी कम होने का कारण यह भी है कि अब भारत में ही संस्कृत को लेकर दिलचस्पी कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि इससे फर्क यूं पड़ता है कि अगर जर्मनी के लोग संस्कृत सीखते हैं तो वे यह भी जानना चाहते हैं कि यह कितनी व्यवहार्य रह गई है। भारतीय साहित्य में ही अब हिंदी, संस्कृत का लगभग पूरी तरह स्थान ले चुकी है(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,6.9.2010)।

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