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22 सितंबर 2010

छह में से पांच नहीं जानते क्या है शिक्षा अधिकार कानून

छह से चौदह साल तक के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के लिए कानून बनाकर सरकार ने तो अपनी पीठ खूब थपथपाई, लेकिन उस पर अमल के छह महीने बाद भी वह आम लोगों से काफी दूर है। आलम यह है कि छह में से पांच लोगों को इस कानून की जानकारी ही नहीं है। खास बात यह कि इसके जरिए सरकार जिनके बच्चों को पढ़ाना चाहती है, वे और भी अनजान हैं। शिक्षा के अधिकार कानून की जमीनी हकीकत के बारे में यह बदरंग तस्वीर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, हरियाणा व पंजाब के लगभग 30 हजार लोगों से बातचीत में सामने आई है। बातचीत में बच्चों के अभिभावकों के अलावा 15 हजार से अधिक छात्र, एक हजार से अधिक पंचायत प्रतिनिधि और लगभग एक हजार शिक्षक भी शामिल थे। गैर-सरकारी संस्था बचपन बचाओ आंदोलन की पहल पर नौ राज्यों के विभिन्न जिलों में 125 स्थानों पर हुई जन सुनवाई में पता चला कि औसतन छह में से एक व्यक्ति को ही इस कानून की जानकारी है। बिहार में यह आंकड़ा पांच में से एक का है। विभिन्न राज्यों से पलायन के बाद दिल्ली की झुग्गी-झोपडि़यों में रह रहे लोगों में तो सिर्फ एक प्रतिशत ने ही इस कानून के बारे में सुना है। इस कानून का मकसद छह से 14 साल तक के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा दिलाना है। उसमें भी गरीब बच्चों पर ज्यादा फोकस करना है। कानून के अमल का जिम्मा राष्ट्रीय व राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग पर है जबकि महज तीन प्रतिशत को ही इस आयोग की जानकारी है। इस कानून के प्रावधानों के तहत बच्चों की पढ़ाई का खर्च सरकार उठाती है लेकिन जन सुनवाई में सामने आया कि 20 प्रतिशत बच्चों से अभी भी दाखिले के लिए फीस ली जाती है। बिहार में यह आंकड़ा 28 प्रतिशत तक है जबकि छात्रों को यूनिफॉर्म, स्थानांतरण प्रमाण-पत्र (टीसी) और अंक तालिका के लिए सभी राज्यों में पैसा लिया जाता है(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,2.9.2010)।

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