मुख्य समाचारः

सम्पर्कःeduployment@gmail.com

22 सितंबर 2010

मजाक बनता मिड-डे मील

दुनिया की सबसे बड़ी मिड-डे मील योजना जिस पर भारत को गर्व है, उस बाबत यह जानकारी आगाह करती है कि देशभर में करीब 73 लाख स्कूली बच्चे मिड-डे मील से वंचित हैं और 200 दिन के बजाय 131 दिन ही स्कूलों में यह भोजन बंटता है। हाल में दिल्ली में शिक्षा मंत्रियों के सम्मेलन में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्च अधिकारियों ने खुलासा किया कि मिड-डे मील परोसने में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली अन्य राज्यों से पिछड़ हुए हैं। इन राज्यों में इस कार्यक्रम के तहत बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने की दर 80 फीसदी से नीचे रही है यानी 20 फीसदी बच्चों को इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

सिर्फ पांच राज्यों में सौ फीसदी बच्चों को मिड-डे मील मिल पा रहा है, जबकि अन्य 26 राज्यों में यह 80 से 100 फीसदी के बीच है। इस महत्वपूर्ण योजना के तहत 11.77 करोड़ बच्चों को शमिल किया गया है। इनमें 8.41 करोड़ प्राथमिक और 3.36 करोड़ मिडिल स्कूलों के बच्चे हैं, लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़े कहते हैं कि करीब 73 लाख बच्चे योजना के लागू होने के 15 सालों के बाद भी छूट रहे हैं। गौरतलब है कि 1995 में शुरू की गई इस योजना के तहत आज देशभर में करीब 12 करोड़ प्राइमरी व अपर प्राइमरी स्कूली विद्यार्थियों को गर्म पका हुआ भोजन परोसा जाता हैं।

इस योजना का मुख्य मकसद सरकारी व सरकारी सहायता पाने वाले स्कूलों में आने वाले गरीब, निम्न मध्यवर्गीय छात्रों को पौष्टिक पूरक आहार देकर उन्हें कुपोषण से बचाना और स्कूलों में बच्चों के नामांकन में वृद्वि के साथ-साथ बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या को कम करना भी है। व‌र्ल्ड फूड प्रोग्राम की ग्लोबल स्कूल फीडिंग रिपोर्ट में मिड-डे मील सरीखी अहम योजनाओं के महत्व के बारे में स्पष्ट किया गया है कि स्कूल फीडिंग कार्यक्रम के कारण अक्सर नामांकन एक साल की अवधि के भीतर दोगुना हो जाता है और विद्यार्थी की एकेडमिक परफार्मेस में दो साल के भीतर 40 प्रतिशत सुधार हो सकता है। इस योजना से लाभान्वित होने वाले बच्चे ज्यादा समय तक स्कूल में टिके रहते हैं और इस पर खर्चा भी बहुत कम होता है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना से जुड़े व राष्ट्रीय सलाहकार समिति के सदस्य ज्यां द्रेज का मानना है कि मिड-डे मील से स्कूल में बच्चों की हाजिरी में वृद्वि और उनके पोषण में सुधार वाले पहलू के अलावा भी इस योजना का महत्व है। जब स्कूल में बच्चे आपस में मिलकर एक जैसा खाना खाते हैं तो उससे जाति आधारित पूर्वाग्रह व गैर-बराबरी की भावना के कमजोर होने की उम्मीद की जा सकती है। यही नहीं, इससे शिक्षा में पसरा लैंगिक फासला भी कम होता है। यह सरकारी योजना समाज के वंचित तबके की जिंदगी में कितना उल्लेखनीय बदलाव ला सकती है, उसके मद्देनजर सर्वोच्च अदालत ने 9 साल पहले वर्ष 2001 में देश के सभी राज्यों को सरकारी व सरकारी सहायता लेने वाले स्कूलों में लागू करने के आदेश दिए थे। सर्वोच्च अदालत ने अपने इस आदेश में यह भी स्पष्ट कर दिया था कि जिन राज्यों में इस योजना के तहत गर्म भोजन देने की बजाए सूखा राशन दिया जाता है, वह राज्य तीन महीने के भीतर गरमागरम पका भोजन देने का बंदोबस्त करे।

प्रधानमंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया की राय में भी ऐसे कार्यक्रम के तहत गरमागरम भोजन मिलना चाहिए। ऐसा आहार बच्चों की सेहत के लिए अच्छा है। इस तथ्यपरक सच्चाई से योजना आयोग, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री भी सहमत हैं कि इस योजना के प्रति हमें ईमानदारी व प्रतिबद्धता हर दृष्टि से दिखाई देनी चाहिए। कल्याणकारी अर्थशास्त्र की वकालत करने वाले अर्थशास्ति्रयों का कहना है कि इससे विकासशील देश की विकासशील अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। मिड-डे मील जैसी समग्रतावादी व समतावादी योजना को लागू करने में देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश पिछड़ा हुआ है, यह चिंता का विषय है।

सनद रहे कि करीब तीन महीने पूर्व इसी राज्य के कई इलाकों के सरकारी स्कूलों में उच्च/सामान्य जाति के बच्चों ने दलित महिला रसोइयों के हाथ का बना खाना खाने से इनकार कर दिया था। मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक कन्नौज और रमाबाई नगर के तकरीबन एक हजार बच्चों ने इस कारण स्कूल जाना बंद कर दिया था। उनके अभिभावकों ने थाने पर पत्थर फेंककर अपना विरोध तक दर्ज कराया था। उच्च/सामान्य जाति के बच्चों ने स्कूल तक जाना बंद कर दिया था और इस कारण ऐसे हालात यह पैदा हो गए कि पंजीकृत छात्रों की उपस्थिति स्कूलों में कम हो गई। दरअसल, जातिगत पूर्वाग्रहों से मिड-डे मील जैसी समग्रतावादी और समतावादी योजना भी बाधित होती है। राजनेताओं और समाज दोनों को यह समझना होगा कि ऐसी कल्याणकारी योजना का मकसद हासिल करने में उनकी भूमिका का क्या महत्व है। उत्तर प्रदेश और दिल्ली के सरकारी स्कूलों के प्राथमिक और मिडिल कक्षाओं के 80 फीसदी से कम बच्चों को ही मिड-डे मील मिल पाता है। छूटे हुए 20 फीसदी बच्चे इसका अतिशीघ्र लाभ उठा सकें, दरकार इस बात की है।

यह सुनिश्चित करना कल्याणकारी राज्य सरकारों का दायित्व है और ये दोनों महत्वपूर्ण राज्य इसमें विफल साबित हुए। मील की गुणवत्ता पर भी अक्सर सवाल उठते रहते हैं। वास्तव में राज्य सरकारें गैर-सरकारी संगठनों को मिड-डे मील बनाने और परोसने का जिम्मा सौंप खुद पीछे हट गई हैं या यों कहें कि वे सीधी जबावदेही से बच रही हैं। इसलिए जब भी मिड-डे मील खाकर बीमार पड़ने वाले बच्चों की कोई घटना सामने आती है तो सरकार जांच कमेटी के गठन और संबंधित गैर-सरकारी संगठनों को काली सूची में डालने की औपाचिरक कार्रवाई करने तक ही अपना दायित्व समझती है।

देशभर में होने वाली ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति सबूत है कि इस महत्वपूर्ण योजना के डिलीवरी स्टैंडर्ड संतोषजनक नहीं हैं। सरकार कल्याणकारी योजना के नाम पर बच्चों को दिए जा रहे मुफ्त भोजन की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं कर सकती। यह देश के गरीब नागारिक वर्ग के साथ धोखा है। एक तरफ सरकार आईआईटी और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में विशेष दिलचस्पी दिखाती है तो दूसरी तरफ वंचित, गरीब वर्ग के बच्चों के लिए शुरू की गई मिड-डे मील योजना के प्रति उत्तर प्रदेश, दिल्ली की सरकारों का उदासीन रवैया कब तक जारी रहेगा। ऐसी सामाजिक योजनाओं को सफल बनाने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना ही राज्य सरकार की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए, बल्कि उस तक सबकी पहुंच के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता की भी मिसाल कायम करनी होगी(अलका आर्य,दैनिक जागरण,22.9.2010)।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।