दिल्ली हाईकोर्ट ने बिना अदालत के आदेश को देखे वकीलों द्वारा पुनः आवेदन दाखिल करने की प्रवृति पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने ऐसे ही एक मामले में आवेदन दाखिल करने वाले वकील पर तीन हजार रुपये जुर्माना लगाया है।
न्यायमूर्ति हीमा कोहली ने फैसले में संबंधित वकील को जुर्माने की राशि मुवक्किल से लेने की अपेक्षा अपनी जेब से भरने का निर्देश दिया है। दरअसल, हत्या और हत्या के प्रयास में अभियुक्त लाकेश कुमार 22 नवंबर 2007 से जेल में बंद है। उसके अधिवक्ता ने जमानत आवेदन दाखिल कर तर्क रखा कि इस मामले में लिप्त तीन अन्य सह अभियुक्तों को हाईकोर्ट ने जमानत प्रदान कर दी है अतः उसके मुवक्किल की भी जमानत मंजूर की जाए। मामले की सुनवाई 30 अगस्त को तय थी लेकिन उस दिन संबधित जज किसी अन्य मामलों की सुनवाई में व्यस्त थे अतः कोर्ट मास्टर ने सुनवाई 16 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दी। अभियुक्त के वकील ने जल्द सुनवाई के लिए आवेदन दाखिल कर दिया लेकिन जब सुनवाई हुई तो वह अदालत में पेश नहीं हुआ। अदालत ने आवेदन को स्वीकार कर सुनवाई नवंबर की अपेक्षा 19 अक्तूबर को तय कर दी। अब पुनः संबंधित वकील ने नया आवेदन दाखिल कर जल्द सुनवाई का आग्रह कर दिया। अदालत ने रिकार्ड देखने के बाद नाराजगी जताते हुए कहा कि अदालत पहले ही आवेदन फैसला दे चुकी है लेकिन वकील साहब ने आर्डर को देखना भी मुनासिब नहीं समझा और नया आवेदन दाखिल कर दिया। उन्होंने अदालत अन्य मामलों की सुनवाई करने की अपेक्षा ऐसे ही मामलों को सुनती रही तो इससे अन्य मामलों की सुनवाई नहीं हो पाएगी अतः वकील पर लापरवाही बरतने पर जुर्माना किया जाना जरूरी है। अदालत ने पहले वकील पर पांच हजार रुपये जुर्माना कर दिया लेकिन उसके आग्रह पर बाद घटाकर तीन हजार कर दिया(अमर उजाला,दिल्ली,29.9.2010)।
सही कदम!
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