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22 सितंबर 2010

मेडिकल प्रोफेशन में डाक्टर और नर्स के अलावा संभावनाएँ

अगर हम एक अस्पताल की कल्पना करें तो सबसे पहले डॉक्टर और नर्स ही हमारे दिमाग में आते हैं। लेकिन क्या इन्हीं से एक अस्पताल का काम चल जाता है? नहीं। बहुत से ऐसे काम हैं, जो पैथोलॉजिस्ट, रेडियोग्राफर, फिजियोथेरेपिस्ट, डायटीशियन, वार्ड बॉय और हॉस्पिटल मैनेजर जैसे प्रोफेशनल करते हैं। आंकड़े गवाह हैं कि सरकारी और निजी क्षेत्र में चिकित्सा सुविधाओं में इजाफे के चलते इस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। इन्हीं सब करियर संभावनाओं पर पेश है फजले गुफरान की रिपोर्ट।

मेडिकल प्रोफेशन का नाम आते ही डॉक्टर या नर्स की तस्वीर सामने आती है। यकीनन इनके बिना इस प्रोफेशन का कोई अर्थ नहीं है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर समझों तो इनके अलावा तमाम ऐसे काम हैं, जिनके बिना चिकित्सा जगत नहीं चल सकता या यूं कहें कि अधूरा है। डॉक्टर द्वारा मरीज को देखे जाने या भर्ती होने पर उसकी तीमारदारी के साथ-साथ पैथोलॉजिकल जांच है, रेडियोग्राफी है, खानपान का मामला है, फीजियोथेरेपी जैसी शाखाएं हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि मेडिकल का क्षेत्र काफी बड़ा है और इसमें कई क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और उनका बेहतर समन्वय ही इस जीवनदायी पेशे को सम्पूर्णता तक ला पाता है। इन क्षेत्रों में भी करियर के रास्ते खुलते हैं। इनकी मांग अधिक है और प्रशिक्षित लोगों की कमी है। संबंधित प्रशिक्षण लेकर इसमें नौकरी मिल सकती है।

इसमें मुख्यत: तीन क्षेत्र हैं-

पैरामेडिकल,
स्पोर्ट सर्विस,
मेडिकल सोशल वर्क।

पहले हम पैरामेडिकल क्षेत्र में संभावनाओं की बात करते हैं-

मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी (एमएलटी)

मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी को क्लिनिकल लेबोरेट्री विज्ञान के रूप में भी जाना जाता है। इसके तहत डॉक्टर मरीज के मर्ज के बारे में अलग-अलग जांच के माध्यम से यह जानने की कोशिश करते हैं कि उसे क्या हुआ है। इस जांच के माध्यम से डॉक्टर बीमारी के सही रूप का पता लगा कर रोगों का निदान करते हैं। इसके अंतर्गत बॉडी फ्लूड का विश्लेषण खून की जांच एवं उनके प्रकार का पता लगाना, ऊत्तकों का परीक्षण, माइक्रोऑर्गेनिज्म स्क्रीनिंग, कैमिकल विश्लेषण, मानव शरीर की कोशिका की गणना, प्लेटलेट्स की गणना की जाती है। मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी के अंतर्गत दो तरह के लोग काम करते हैं-

तकनीशियन, टेक्नोलॉजिस्ट

मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट के मुख्यत: पांच प्रकार के काम होते हैं, जिनमें ब्लड बैंकिंग, क्लिनिकल कैमिस्ट्री, हेमेटोलॉजी, इम्यूनोलॉजी एवं माइक्रोबायोलॉजी से जुड़ी चीजों की जांच करना होता है, जबकि मेडिकल तकनीशियन का काम रूटीन चेकअप का होता है, जो मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट के निर्देशानुसार काम करता है।

योग्यता एवं कोर्स - लैब तकनीशियन के लिए कई प्रकार के कोर्स विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी पैरा मेडिकल संस्थानों द्वारा संचालित किए जाते हैं, जिनमें बैचलर ऑफ मेडिकल लेबोरेट्री टेक्नोलॉजी (बीएमएलटी), डिप्लोमा इन मेडिकल लेबोरेट्री टेक्नोलॉजी (डीएमएलटी) शामिल हैं। इन दोनों कोर्स के लिए न्यूनतम योग्यता विज्ञान विषय के साथ 12वीं उत्तीर्ण होना है। इनके अलावा विभिन्न विधाओं में सर्टिफिकेट कोर्स भी उपलब्ध हैं। एक माहिर लैब तकनीशियन की हॉस्पिटल, प्राइवेट लेबोरेट्रीज, ब्लड बैंक, क्लिनिक्स में खासी डिमांड रहती है।

रेडियोग्राफी

जांच के दौरान एक्सरे, एंजियोग्राफी, रेडियोग्राफी के बारे में सब ने सुना होगा। इनका इस्तेमाल बीमारी की पहचान करने में होता है। शरीर के किस हिस्से या ऊत्तक का एक्सरे करना है, यह डॉक्टर बताता है। रेडियोग्राफर्स को उपकरणों का इस्तेमाल करना और नई टेक्नोलॉजी और कार्यविधि अपनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। आमतौर पर विज्ञान विषय जैसे जीव विज्ञान, शरीर विज्ञान और शरीर रचना विज्ञान में दिलचस्पी होनी चाहिए। एक रेडियोग्राफर बनने के लिए डिप्लोमा इन मेडिकल रेडियोग्राफी टेक्नोलॉजी का कोर्स करना होता है। यह कोर्स करने के लिए 12वीं पास होना जरूरी है।

फिजियोथेरेपी

फिजियोथेरेपी या फिजिकल थेरेपी के माध्यम से शरीर के अंगों का बेहतर संचालन सुनिश्चित किया जाता है। यह काम व्यायाम व हीट, वैक्स और इलेक्ट्रिसिटी के माध्यम से किया जाता है। मरीजों की देखभाल के लिए फिजियोथेरेपिस्ट अब अनिवार्य होते जा रहे हैं। इनकी जरूरत आईसीयू में भी पड़ती है। फिजियोथेरेपी का विस्तारित रूप है ऑक्यूपेशनल थेरेपी।

ऑक्यूपेशनल थेरेपी

यह पैरा मेडिकल प्रोफेशन में एक तेजी से उभरता हुआ नाम है। इसमें भी शारीरिक विकलांगता अथवा किसी तरह की मानसिक अक्षमता के शिकार लोगों को सक्षम बनाने का काम किया जाता है। आज फिजियोथेरेपिस्ट की खूब डिमांड है। इसके तहत ऑक्यूपेशनल थेरेपी और प्रोस्टेटिक्स एंड ऑथरेटिक्स विशेषज्ञ की भी डिमांड बढ़ी है।

एक फिजियोथेरेपिस्ट की अस्पताल के अंदर ऑथरेपेडिक डिपार्टमेंट, मानसिक तथा शारीरिक रूप से अस्वस्थ बच्चों के स्कूल तथा हेल्थ इंस्टीटय़ूट में मांग हमेशा बनी रहती है। इनकी मांग भारत में ही नहीं, विदेश में भी खूब है। बैचलर इन फिजियोथेरेपी, बैचलर इन ऑक्यूपेशनल थेरेपी कोर्स हैं। फिजियोथेरेपिस्ट की बढ़ती मांग के चलते इस फील्ड में ट्रेंड लोगों के लिए कार्य करने के कई विकल्प हैं। सरकारी एवं निजी अस्पतालों के ऑथरेपेडिक डिपार्टमेंट में तो बेहतर स्कोप हैं ही, यदि आप जॉब नहीं करना चाहें तो प्राइवेट प्रैक्टिस भी कर सकते हैं। शिक्षक एवं रिसर्चर के रूप में भी करियर बना सकते हैं। इसके लिए अहम कोर्स है - डिप्लोमा इन फिजियोथेरेपी टेक्नोलॉजी (बीपीटी), मास्टर्स इन फिजियोथेरेपी टेक्नोलॉजी (एमपीटी)

ऑडियोलॉजी

जहां डॉक्टर का काम खत्म होता है, वहां ऑडियोलॉजिस्ट का काम शुरू होता है। बतौर थेरेपिस्ट वह मरीज की हर हरकत पर नजर रखता है। उसकी देखभाल करता है। वह वॉयस डिसऑर्डर में स्पेशलाइज्ड होता है। बोलने और सुनने संबंधी विकारों को जानने व समझने का प्रयास करता है। इस क्षेत्र में डिग्री या डिप्लोमा कोर्स में प्रवेश के लिए 12वीं में जीव विज्ञान अनिवार्य विषय के रूप में पास होना जरूरी है। डिग्री स्तर पर छात्रों को तीन साल का अध्ययन करना पड़ता है। इसकी जांच तीन तरह से होती है-

ऑडियोमेट्री टैस्ट, इम्‍पेडेंस टैस्ट, बेरा टैस्ट

कितने पावर और कौन सा (ऑनलॉग या डिजिटल) हियरिंग एड मरीज के लिए फिट रहेगा, इस बात का निर्णय एक ऑडियोलॉजिस्ट करता है। भारत में स्पीच थेरेपिस्ट और ऑडियोलॉजिस्ट की काफी कमी है। यहां आप अस्पतालों, मेडिकल कालेजों, ईएनटी डिपार्टमेंट, पीडियाट्रिक्स डिपार्टमेंट में काम कर सकते हैं या कंसलटिंग स्पीच पैथेलॉजिस्ट के रूप में अपने करियर को नई दिशा दे सकते हैं।

डायटीशियन

मरीज अपनी बीमारी के लिहाज से क्या, कितना और कब खाएं, यह तय करने का काम डायटीशियन करता है। डायटीशियन यह सुनिश्चित करता है कि मरीज को सही खुराक भी मिलती रहे और परहेज भी पूरा मिलता रहे। कोई इसे पेशे के तौर पर अपनाना चाहता तो इसके लिए कोर्स हैं-

डिप्लोमा इन डायटीशियन, पीजी डिप्लोमा इन डायटीशियन, डिग्री इन डायटीशियन, बीएससी इन डायटीशियन, एमएसी इन डायटीशियन, इसके लिए न्यूनतम योग्यता है 12वीं पास।

एक्सपर्ट व्यू

टेक्निकल पोस्ट में वेकेंसीज ज्यादा हैं
डॉं एके दुबे (एम एस) बीएलके मेमोरियल हॉस्पिटल, नई दिल्ली

मेडिकल का दायरा सिर्फ एक डॉक्टर और नर्स तक ही सीमित नहीं है, इसमें कई तरह के पेशेवर लोग जुड़े होते हैं। इसे कई भागों में विभाजित किया जा सकता है। पैरा मेडिकल, तकनीशियन, स्पोर्ट सर्विसेज आदि। पैरा मेडिकल के तहत रेडियोग्राफी, ओटी, लेबोरेटरी तकनीशियन, फिजियोथेरेपिस्ट, न्यूक्लियर मेडिसिन, डायटीशियन आते हैं। वहीं स्पोर्ट सर्विसेज में हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन, एचआर, एफएंडबी, फ्रंट ऑफिस है। एक अस्पताल में कई मेडिकल सोशल वर्कर होते हैं। इसके बाद वार्ड बॉय की भी बड़ी तादाद होती है अस्पतालों में। अस्पताल का नाम आता है तो लोगों का ध्यान सिर्फ डॉक्टर और नर्स की तरफ ही जाता है, लेकिन आपको बता दूं कि टेक्निकल पोस्ट में वेकेंसीज ज्यादा हैं। एक अस्पताल में जितने बेड होते हैं, उससे पांच गुना ज्यादा एम्पलॉयी नियुक्त किये जाते हैं। यह एक लेबर इंटेंसिव इंडस्ट्री है। अगर आप जॉब की बात करें तो समय-समय पर इनकी नियुक्तियां निकलती रहती हैं। हर अस्पताल की साइट पर जॉब की डिटेल मिल जाएगी। इनकी डिमांड सिर्फ अस्पतालों में ही नहीं, लैब्स, क्लिनिक्स, हर जगह है। मैं तो यही कहूंगा कि किसी कारणवश अगर डॉक्टर या नर्स बनने का सपना साकार नहीं हो पाया है और अस्पताल में नौकरी करनी है तो पैरा मेडिकल, सोशल वर्कर बन कर अपनी मुराद पूरी कर सकते हैं। समाज को कुछ देना चाहते हैं तो यह प्रोफेशन भी बेहतरीन है।

कुछ करियर ये भी

हॉस्पिटल मैनेजर

अस्पताल के गेट से लेकर टेरिस तक हॉस्पिटल मैनेजर की ड्यूटी का फैलाव होता है। उसकी खोजी निगाहें यह पता लगाती हैं कि कहीं सफाई में कमी तो नहीं, कहीं से प्लास्टर तो नहीं टूट रहा है, स्ट्रेचर्स की हालत क्या है, फ्रंट ऑफिस ठीक से काम कर रहा है या नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि हर वो हर चीज जो अस्पताल को सुचारू रूप से चलाने के काम आती है दुरुस्त हो यह सुनिश्चित करना हॉस्पिटल मैनेजर का काम है। उसकी अहमियत इसी से जाहिर होती है कि वह मरीजों से मिल कर अस्पताल, इसकी कार्यप्रणाली, उपलब्ध सुविधाओं व अन्य समस्याओं के बारे में पूछता है और फिर अस्पताल के वरिष्ठ अधिकारियों तक उन बातों को पहुंचाता है, ताकि अस्पताल को मरीजों के लिए सुविधा-संपन्न बनाया जा सके। हॉस्पिटल मैनेजर की नौकरी के लिए जरूरी डिग्री-

बैचलर ऑफ हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन

यह कोर्स कई संस्थानों में कराया जाता है और इसके लिए बायोलॉजी के साथ 12वीं उत्तीर्ण होना जरूरी है।

मेडिकल सोशल वर्कर

सरकारी या गैर सरकारी अस्पतालों में इनकी नियुक्ति अनिवार्य होती है। ये मेडिकल सोशल वर्कर मरीजों के तीमारदारों को हर तरह से सपोर्ट करते हैं। उन्हें ढांढ़स देते हैं। इनका काम जिम्मेदारी भरा होता है। हर 100 बेड पर चार मेडिकल सोशल वर्कर नियुक्त किये जाते हैं। स्नातक के बाद मास्टर्स इन सोशल वर्क कोर्स कर इस पद के दावेदार बन सकते हैं। सैलरी भी बेहतर है।
इसके अलावा एक अस्पताल को सुचारू रूप से चलाने के लिए बड़ी तादाद में ऑफिस स्टाफ, एचआर विभाग होता है। फूड एंड बेवरेज (एफएंडबी) और फ्रंट ऑफिस स्टाफ की भी हॉस्पिटल में खासी जरूरत होती है। हर अस्पताल में कैंटीन और कैफेटेरिया होता है, जहां वर्करों की नियुक्ति होती है। फ्रंट ऑफिस के लिए दजर्नों की संख्या में लोग रखे जाते हैं(फजले गुफरान,हिंदु्स्तान,दिल्ली,21.9.2010)

1 टिप्पणी:

  1. बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारी ।
    छात्रों के लिए अच्छा मार्गदर्शन ।

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