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07 सितंबर 2010

छत्तीसगढ़ी से दूर हैं छत्तीसगढ़िया

छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा भले ही मिल गया हो, लेकिन मातृभाषा नई पीढ़ी से अभी भी कोसों दूर है। पहली से पांचवीं तक के बच्चे अभी भी ‘अ’ अनार का और ‘क’ कबूतर का पढ़ रहे हैं। ऐसी स्थिति तब है, जब मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने वर्ष 2009 से राजभाषा की पढ़ाई प्राइमरी स्कूल में शुरू कराने की घोषणा की थी।भाजपा शासित केंद्र सरकार के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ राज्य बना और मातृभाषा ‘छत्तीसगढ़ी’ को भाजपा शासनकाल में ही राजभाषा का दर्जा मिला।

राजभाषा आयोग का गठन हुआ और दावा किया गया कि बच्चे आने वाले सत्र में ‘अ’ अनार के बजाय अमली और ‘क’ कबूतर के बजाय कलिंदर पढ़ेंगे। इस तरह के दावे अब हर शिक्षण सत्र से पहले होने लगे हैं। इस शिक्षण सत्र में भी यही कहा गया कि राजभाषा की वर्णमाला तैयार है और पहली से पांचवीं कक्षा के बच्चे मातृभाषा में पढ़ाई करते नजर आएंगे।

नए शिक्षण सत्र के लिए पुस्तक का प्रकाशन हो गया और पढ़ाई भी शुरू हो गई, लेकिन बच्चे पुराने कोर्स से ही पढ़ाई कर रहे हैं। यह जरूर है कि सरस्वती शिक्षण संस्थान ने राज्य शासन को पीछे छोड़ते हुए अरुण, उदय से लेकर पहली कक्षा तक में छत्तीसगढ़ी पढ़ाए जाने की घोषणा कर दी है। सरस्वती शिशु मंदिर में 2 अक्टूबर से राजभाषा की पढ़ाई होगी। ऐसे में कहा जा रहा है कि छत्तीसगढ़िया अभी भी छत्तीसगढ़ी से दूर है। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिलने के बाद भी संशय की स्थिति बनी हुई है।

दरअसल शासन अब तक यह तय नहीं कर पाया है कि छत्तीसगढ़ी की पढ़ाई मातृभाषा के रूप में होगी या फिर एक विषय के रुप में। इतना ही नहीं, सरकार इस बात से भी चिंतित है कि राज्य में छत्तीसगढ़ी पढ़ाया जाना कहीं जन भावना के विपरीत तो नहीं होगा। दरअसल प्रदेश में हर दस किलोमीटर बाद बोली बदल जाती है। राज्य में छत्तीसगढ़ी के अलावा हल्बी, गोंडी, सरगुजिहा व कुडूख बोली की भी गहरी पैठ है। एक वर्ग सरकार की इस चिंता को छत्तीसगढ़ी मातृभाषा का कद छोटा करने का षड़यंत्र भी ठहराता है। बहरहाल यह तय है कि राजभाषा का दर्जा मिलने के बाद भी छत्तीसगढ़ी मातृभाषा की स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।

पाठ्यक्रम की कैद से निकलना जरूरी.विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर यशपाल सहित कई बुद्धिजीवियों ने बच्चों का पाठ्यक्रम की कैद से निकालने की सलाह दी थी। एनसीईआरटी के स्कूली कार्यक्रम का नया मसौदा प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय संचालन समिति ने वर्ष 2006 में तैयार किया था, जिसमें शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन की बात कही गई थी। श्री यशपाल ने कहा था कि पाठ्यक्रम गंदी है। बच्चों को इसकी कैद से निकालना जरूरी है। एक वे ही क्यों भाषाविदों का भी यही तर्क है कि बच्चों की प्राथमिक पढ़ाई घर की भाषा (स्थानीय) से ही होनी चाहिए। एक भाषा सीखने के बाद दूसरी भाषा सीखना सरल हो जाता है(दैनिक भास्कर,बिलासपुर,7.9.2010)।

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