ऑफिस में कुछ लोग सिर्फ तकरार करना जानते हैं। उन्हें सिर्फ अपनी बात सही लगती है। वे तर्क और तकरार को एक ही तराजू पर तौलते हैं। कहीं आप भी तो इस मुश्किल में नहीं हैं?
कार्यस्थल पर अक्सर ऐसे लोग मिल ही जाते हैं जो अपनी बात मनवाने के लिए घंटों बहस करते हैं। समझदारी इसी में हैं कि आपका सामना जब ऐसे लोगों से हो तो इनसे उलझने की बजाय इन्हें नजरअंदाज करें। आप हमेशा यह ध्यान रखें कि तकरार करने वाले लोग हमेशा खाली दिमाग के होते हैं लेकिन यह खुले दिमाग के होने का दिखावा करते हैं। ऐसे लोगों को पता होता है कि यह जो बोल रहे हैं वह ठीक नहीं है लेकिन झूठे अहंकार में आकर जिद पर अड़े होते हैं कि जो वो कह रहे हैं, वही सही है। इनके मन में हमेशा दूसरों को हराने की भावना होती है। तकरार करने वाले लोगों में एक यह भी बात होती है कि यह अच्छे श्रोता नहीं होते हैं। यह सिर्फ कहना जानते हैं भले ही इनकी बात बेतुकी क्यों न हो। प्रसिद्ध उद्यमी सायरस चिंग ने कहा था कि ‘मैंने बहुत पहले ही यह सीख लिया था कि सूअर से कुश्ती कभी नहीं लड़नी चाहिए। इससे आप तो मैले होंगे साथ ही यह सूअर को अच्छा लगेगा।’ तकरार करने वाले लोग हूबहू ऐसे ही होते हैं। ये लोग पहले से ही दिमाग में फ्रेम बनाए होते हैं और यही वजह होती है कि ये उस फ्रेम से बाहर नहीं निकल पाते हैं। याद रखें एक बड़ा मुँह हमेशा छोटी बात ही करता है। इसलिए इनसे दूरी ही बनाए रखें। तकरार करने वाले व्यक्ति कैसे होते हैं एक उदाहरण देखिएः
एक ऑफिस पार्टी है जहाँ लोग मस्ती की बातें कर रहे होते हैं। बोर न हों इसलिए बीच-बीच में किसी न्यूज पर चर्चा भी करते हैं। एक व्यक्ति जो तकरार करने का आदी होता है कहता है,‘पता है कल रात जो भारत-श्रीलंका का मैच हुआ उसमें इण्डिया 23 रन से जीत गया।’ उसकी यह जानकारी गलत है क्योंकि आप, आज का अखबार पढ़ के आए होते हैं जिसकी एक कॉपी आपकी गाड़ी में पड़ी भी होती है। इसलिए आप कहते हैं,‘आप शायद कल के मैच का नहीं उसके पहले वाले मैच की बात कर रहे हैं। कल के मैच में इण्डिया 30 रन से जीता था।’ आपकी बात सुनकर वह प्रतिक्रिया देते हुए कहता है,‘नहीं, 23 रन से जीता था।’ उस समय आप क्या करेंगे? गाड़ी में रखा पेपर लाएँगे और उस व्यक्ति को गलत ठहराएँगे या उसे नजरअंदाज करेंगे या फिर आप भी जिद पर अड़ जाएँगे। जाहिर है,अगर आपमें जरा भी समझदारी होगी तो आप दूसरा विकल्प अपनाएँगे। याद रखिए तकरार करने वाले लोग हमेशा अपनी बात मनवाना चाहते हैं और उसके लिए वे घंटों बहस करने के लिए भी तैयार हो जाते हैं। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि उन्हें नजरअंदाज करें। तकरार करने वाले लोगों की जिन्दगी उनसे शुरू होकर उन पर ही खत्म होती है।
तर्क और तकरार
■ तर्क जहाँ बुद्धिमानी से आता है वहीं तकरार बेवकूफी का परिचायक है।
■ तर्क खुले दिमाग का नतीजा है वहीं तकरार खाली दिमाग से आता है।
■ तकरार क रने वाले लोग ‘कौन सही’ है पर फोकस्ड रहते हैं जबकि तर्क करने वाले ‘क्या सही है’ के पक्षधर होते हैं।
■ तकरार करने वाले लोग राई का पहाड़ बनाने वालों में से होते हैं भले ही उनकी बातों का नतीजा शून्य ही निकले। जबकि तर्क करने वाले लोग बेवजह किसी पचड़े में नहीं पड़ते क्योंकि उनके लिए वक्त काफी मायने रखता है।
■ तकरार करने वाले छोटी सी बात को भी सम्मान् और प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं जबकि तर्क करने वालों में छोटी-बड़ी बात की समझ बखूबी होती है।
(हिंदुस्तान,लखनऊ,7.9.2010)
आपसे सहमत।
जवाब देंहटाएंपर आज अधिकतर लोग तकरार करते हैं, तर्क नहीं।
हरीश गुप्त की लघुकथा इज़्ज़त, “मनोज” पर, ... पढिए...ना!
आपका कहना सो प्रतिशत सही हे। पर ज्यादा तकरारे ही होती हे।
जवाब देंहटाएंहमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
मालीगांव
साया
लक्ष्य
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