उत्तराखंड के संस्कृत विद्यालयों में पढ़ रहे आठ हजार से ज्यादा छात्र-छात्राओं को अब परीक्षा के लिए अन्य बोर्ड पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। संस्कृत शिक्षा के ड्रीम प्रोजेक्ट पर अमल की अगली कड़ी में सरकार ने संस्कृत शिक्षा परीक्षा परिषद् गठित करने का फैसला किया है। वित्त विभाग ने परिषद के लिए फिलवक्त नौ पदों को मंजूरी दी है। देवभूमि में अब देवभाषा के रूप में प्रतिष्ठित संस्कृत की शिक्षा को राज्य में अपने पैरों पर खड़ा होने में अड़चनें दूर की जा रही हैं। इस कड़ी में सरकार ने अपने पहले फैसले में संशोधन कर दिया है। संस्कृत निदेशालय की स्थापना के साथ ही यह तय किया गया था कि भविष्य में निदेशालय स्तर से ही संस्कृत शिक्षा की परीक्षाएं भी आयोजित की जाएंगी। इस वजह से अभी तक संस्कृत की परिषदीय परीक्षा विद्यालयी शिक्षा परीक्षा परिषद, रामनगर के जिम्मे है। परिषद ने कामकाज के बढ़ते बोझ और विद्यालयीय शिक्षा को ढर्रे पर लाने की कवायद का हवाला देते हुए सरकार से संस्कृत शिक्षा की परीक्षाओं के लिए अलग से परिषद का गठन करने की पैरवी की थी। सरकार ने इसे स्वीकार कर पृथक परिषद गठित करने का फैसला किया है। परिषद बनने से प्रदेश के 84 संस्कृत विद्यालयों को राहत रहेगी। इनमें 71 सहायता प्राप्त, छह राजकीय, छह अनुदानविहीन और एक केंद्रीय सहायताप्राप्त विद्यालय शामिल हैं। संस्कृत विद्यालयों के मान्यता से लेकर तमाम मसलों पर अब जल्द फैसला संभव होगा। साथ ही छठवीं से आठवीं की प्रथमा, नौवीं व दसवीं की पूर्व मध्यमा और 11वीं व 12वीं की उत्तर मध्यमा परीक्षा और परिणाम घोषित करने का दारोमदार अब नई परिषद पर होगा। पुरजोर कोशिश यह की जा रही है कि परिषद इसी सत्र से प्रारंभ हो। संस्कृत महकमे ने परिषद के लिए 13 पद प्रस्तावित किए थे। वित्त महकमे ने नौ पदों को हरी झंडी दिखाई है। इनमें परिषद् के सचिव व उप-सचिव पद के दो पद स्थायी होंगे। शेष सात पदों पर संविदा भर्ती की जाएगी। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक महकमा दो के बजाए तीन स्थायी पद पर जोर दे रहा है। परीक्षा के कामकाज के लिए प्रवर सहायक के एक स्थायी पद की मांग की जा रही है। इस बारे में प्रस्ताव जल्द सरकार के सुपुर्द किया जाएगा(रविंद्र बड़थ्वाल,दैनिक जागरण,देहरादून,11.10.2010))।
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