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11 अक्टूबर 2010

मध्यप्रदेशःमहत्वाकांक्षा कमज़ोर कर रही है कर्मचारी आंदोलन

अस्सी-नब्बे के दशक तक कर्मचारी संगठनों के नेताओं की एक आवाज पर सरकार व प्रशासनिक हलकों में उथल-पुथल मच जाती थीं। पुराने दौर में कर्मचारियों की कोई मांग भी उठती थी , तो सरकार स्वयं मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों को बुलाकर बात करती थीं। वर्तमान में कर्मचारियों की मांग उठने पर सालों-साल धरने प्रदर्शन करने के बाद भी कुछ नहीं मिल रहा है। इतना ही नहीं वर्तमान में कर्मचारी संगठनों के आपसी विवाद का फायदा कुछ नेता बखूबी उठा रहे है। वर्ष 1990 के पूर्व तक शासकीय मान्यता प्राप्त तीन कर्मचारी संगठन हुआ करते थे। इसमें मप्र राजपत्रित अधिकारी संघ, मप्र तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ व लघुवेतन कर्मचारी संघ था। उक्त तीन कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों की एक आवाज पर सारा कर्मचारी जगत एकत्रित हो जाया करता था। उस दौर में मप्र तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष नारायण प्रसाद शर्मा व सत्यनारायण तिवारी जैसे कुछ ऐसे नाम थे, जिनके आगे सरकार का हर नुमाइंदा सलीके से पेश आता था। लघु वेतन कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष देवी प्रसाद शर्मा, राज्य कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष गणेश दत्त जोशी व जिले में उदयनारायण त्रिवेदी, सुरेश जाधव ऐसे नाम थे, जो कर्मचारी जगत में सक्रिय थे। तीन कर्मचारी संगठनों के मान्यता के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल बोरा ने 1990 में मंत्रालयीन कर्मचारी संघ व शिक्षक कांग्रेस को मान्यता दी। इस समय तक प्रदेश में पांच मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठन हो गए थे। इसके बाद दिग्विजय सिंह की सरकार बनी। इनके कार्यकाल में कर्मचारियों का दबदबा कुछ समाप्त होने लगा। सबसे पहले दिग्विजय सरकार द्वारा कर्मचारी कांग्रेस को मान्यता दी गई। इसके बाद तो दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठनों की बाढ़ ला दी। उन्होंने एक साथ 13 कर्मचारी संगठनों को मान्यता प्राप्त घोषित कर दिया। उनके कार्यकाल में 19 मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठन हो गए। नए मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठनों के अधिकांश पदाधिकारी मप्र तृतीय शासकीय वर्ग कर्मचारी संघ से टूटकर आए थे। इससे तृतीय वर्ग कर्मचारी संगठन कुछ कमजोर पड़ गया। इस बीच इस संगठन को नेतृत्व भी ठीक नहीं मिला था। वहीं मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठनों की संख्या ज्यादा बढ़ जाने से कर्मचारियों की मारक शक्ति सरकार के सामने कुछ हद तक टूट गई।

19 में से 9 कर्मचारी संगठन विवादित :
वर्तमान में शासकीय मान्यता प्राप्त 19 कर्मचारी संगठनों में से नौ कर्मचारी संगठनों में विवाद है। एक कर्मचारी संगठन का पंजीयन निरस्त कर दिया है। विवादित कर्मचारी संगठनों में मप्र लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ, पटवारी संघ, मप्र वन कर्मचारी संघ, मप्र तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ, लघु वेतन कर्मचारी संघ, राजपत्रित अधिकारी संघ, मप्र डिप्लोमा इंजीनियर एसोसिएशन व मप्र शिक्षक संघ शामिल है। अविवादित कर्मचारी संगठनों में मंत्रालयीन कर्मचारी संघ, मप्र शिक्षक कांग्रेस, मप्र कर्मचारी कांग्रेस, मप्र अनुसूचित जाति जनजाति अधिकारी कर्मचारी संघ, मप्र वाहन चालक यांत्रिकी कर्मचारी संघ, मप्र आईटीआई तकनीकी कर्मचारी संघ, मप्र राजस्व निरीक्षक संघ, मप्र पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी संघ, मप्र राज्य कर्मचारी संघ व मप्र पिछड़ा वर्ग अधिकारी कर्मचारी संगठन शामिल है। वर्तमान में बड़े कर्मचारी संगठनों के विवाद का फायदा सरकार को ही हो रहा है। संगठनों में अहम की लड़ाई के चलते इनकी शक्ति काफी कम हो गई है। अध्यक्षीय मंडल व अधिकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति बनाकर कर्मचारियों को एकजुट करने के कुछ प्रयास किए जा रहे है, लेकिन इसमें भी कुछ कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारी ऐसे है, जोकि सरकार के साथ मिले है। जिससे अंत समय में कर्मचारियों की आंदोलन अंत समय पर पहुंचने पर टूट जाता है।

सिर्फ विज्ञप्तिवीर है कुछ कर्मचारी नेता :
वर्तमान में कुछ कर्मचारी नेता तो सिर्फ विज्ञप्तिवीर बनकर रह गए है। छोटी-छोटी बात पर धरना प्रदर्शन की धमकी देने वाले उक्त कर्मचारी संगठन कर्मचारियों के नाम पर सिर्फ अपनी रोटी सेंक रहे है। जिससे कर्मचारी संगठनों की सरकार व प्रशासनिक हलकों में कमजोर पकड़ हुई है(नीरज गौर,दैनिक जागरण,भोपाल,11.10.2010)।

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