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11 अक्टूबर 2010

प्राईवेट संस्थानों में यौन-उत्पीड़न


  • एक इंश्योरेंस कंपनी में काम करने वाली महिला रजनी (परिवर्तित नाम) डेप्यूटी ऑफीसर के बुरे बर्ताव के कारण जॉब छोड़ने पर विवश हो गई। महिला अपने सीनियर ऑफीसर की गालियां देकर बात करने और कटु शब्दों के इस्तेमाल से परेशान थी। 
  • एक प्राइवेट हॉस्पिटल में बतौर नर्स काम कर रहीं अनीता (बदला हुआ नाम) की शिकायत थी, कि हॉस्पिटल प्रबंधन द्वारा उनके वास्तविक दस्तावेज नहीं दिए जा रहे। इस वजह से हॉस्पिटल में काम करने में परेशानी आने के बावजूद वे जॉब बदल नहीं पा रही हैं। प्रबंधन के पास वास्तविक दस्तावेज होने के कारण वह उनके मनमुताबिक काम करवाते हैं। 
  • एक बैंक मैनेजर के खिलाफ महिला कर्मचारियों के ग्रुप ने महिला आयोग में शिकायत दर्ज कराई। महिलाओं ने शिकायत की, कि मैनेजर को गाली देकर बात करने की बुरी आदत है। अभद्र शब्दों के इस्तेमाल से ऑफिस का माहौल खराब हो रहा है।

ये तीन केस केवल उदाहरण मात्र हैं, जो वर्तमान समय में महिलाओं के साथ कार्य स्थल पर हो रहे दु‌र्व्यवहार को दर्शाते हैं, ऐसे तमाम केस और हैं जहां सरकारी नहीं, बल्कि प्राइवेट सेक्टर में महिलाएं उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं। पहले यह महिलाएं अपनी आवाज को दबाकर रखती थीं, लेकिन अब वे खुलकर इनका विरोध करने लगी हैं। उनमें पिछले कुछ सालों में अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने को लेकर जागरुकता बढ़ी है और अब वे बार-बार जॉब से स्विच करने की बजाय कानून की मदद लेकर परिस्थितियों को ठीक करने के प्रयास कर रही हैं। यही वजह है कि अब महिला आयोग में प्राइवेट दफ्तरों के खिलाफ कार्यस्थल प्रताड़ना के मामले बढ़े हैं। महीने में 2-3 केस पहले आयोग में प्राइवेट संस्थानों के खिलाफ महिलाओं की शिकायत बिलकुल नहीं आती थी, लेकिन अब महीने में 2-3 केस प्राइवेट संस्थानों के खिलाफ आते हैं। अधिकतर मामलों में पाया गया कि महिलाओं को मनचाहे ढंग से काम करवाने, बिना किसी कारण नौकरी से निकाल देने, ओरिजनल पेपर्स रख लेने जैसी शिकायतें आती हैं। अभी तक सेक्सुअल हरासमेंट जैसी शिकायतें सामने नहीं आई हैं, हो सकता है कि इस तरह की समस्याओं को संस्थान घरेलू स्तर पर ही सुलझा लेते हों। सरकारी की तुलना में कम कार्य स्थल प्रताड़ना के मामले प्राइवेट की तुलना में सरकारी दफ्तरों से काफी ज्यादा आते हैं। आयोग के मेम्बर्स के मुताबिक प्राइवेट सेक्टर में काम कर रही महिलाओं के पास जॉब स्विच करना एक ऑप्शन रहता है, जबकि सरकारी महिलाएं अपनी जॉब को नहीं छोड़ना चाहतीं। दूसरे संस्थान में जगह मिलने के ऑप्शन के कारण परेशानी आने पर प्राइवेट संस्थान की महिलाएं कानून के चक्करों में पड़ने की तुलना में स्विच करना ज्यादा पसंद करती हैं। जरूरी है महिला शिकायत निवारण प्रकोष्ठ सरकार द्वारा विशाखा गाइड लाइन लाने के बाद से हर प्राइवेट और सरकारी संस्थान में एक महिला शिकायत निवारण प्रकोष्ठ बनाना बेहद अनिवार्य है। गाइड लाइन के मुताबिक, प्रकोष्ठ में दो महिला और दो पुरुष सदस्य होंगे। एक व्यक्ति शिकायत दर्ज करने एवं काउंसलिंग के लिए भी होना अनिवार्य है। प्रकोष्ठ की हेड संस्थान की किसी सीनियर महिला को बनाने का प्रावधान है। संस्थान में किसी सीनियर महिला के न होने पर संस्थान किसी एनजीओ की वरिष्ठ कार्यकर्ता को इस पद पर नियुक्त कर सकता है(रश्मि प्रजापति,दैनिक जागरण,भोपाल,11.10.2010)।

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