पिछले दो दशक में अयोध्या के शैक्षणिक विकास में कोई खासा परिवर्तन नहीं हुआ है । एक-दो इंटर और डिग्री कॉलेज खुले तो जरूर पर वे दुकान बन कर रह गए । प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों की जिस मुकाबले में मांग बढ़ी और जितनी लकदक व्यवस्था होनी चाहिए थे वह साकेत महाविद्यालय ही नहीं, कहीं उपलब्ध नहीं है । प्रोफेशनल पाठ्यक्रम शुरू तो हुए लेकिन उनके साथ महाविद्यालय प्रशासन संगति नहीं बिठा सका । जहां चारों ओर कंप्यूटरीकरण का जोर है वहां यह महाविद्यालय आज भी मैनुअल चल रहा है । पुस्तकालय तक का ऑटोमेशन नहीं हो पाया है । साकेत में कोई शोध विभाग नहीं है । अवध विश्वविद्यालय में श्रीराम और अंबेडकर के नाम से दो शोध पीठें तो गठित हुईं लेकिन इनकी बिल्ंिडग भर हैं । खस्ताहाल शिक्षा का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले डेढ़ दशक से कार्यवाहक प्राचार्य की बदौलत साकेत महाविद्यालय चल रहा है । शिक्षा की कुछ छिटपुट संस्थाएं वजूद में तो आईं लेकिन उनका कार्य "मील का पत्थर" साबित नहीं हुआ । परमहंस डिग्री कॉलेज, लक्ष्मण बाल विद्या मंदिर और एक आईटीआई खुला । पुराने स्कूलों में महाराजा इंटर कॉलेज और तुलसी आर्यकन्या इंटर कॉलेज हैं । स्तब्ध कर देने वाली घटना तो देववाणी संस्कृत के साथ हुई । कुछ दशक पहले तक मंदिरों से घंटे और घड़ियाल की मधुर ध्वनियों के साथ वेद की ऋचाएं भी कानों में गूंज पड़ती थीं लेकिन अब संस्कृत का पहले जैसा शास्त्रीय पठन-पाठन का माहौल नहीं रहा । हालांकि संस्कृत महाविद्यालय तो दर्जन भर से ज्यादा हैं लेकिन गुरुकुल संस्कृत महाविद्यालय को छोड़ हर जगह बस रस्म अदायगी भर है । साहित्य और संस्कृति के पुनरुत्थान में अयोध्या शोध संस्थान ने शायद अन्य संस्थानों के मुकाबले बड़ा कायम किया । अवध व अवधी के विकास के प्रति यह संस्थान सजग और सतर्क है । इसे अवध विश्वविद्यालय ने शोध कराने की मान्यता दी है । संस्कृत विश्वविद्यालय को स्थापित करने की घोषणा मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में हुई लेकिन यह बस जुबानी जुगाली रहा । जमीन पर नहीं उतरा । सांसद निर्मल खत्री को भी यह कचोटता है कि ज्ञान के क्षेत्र में अयोध्या की वह पहुंच और हैसियत नहीं दिखाई पड़ती है जो होनी चाहिए । वह बताते हैं कि मेरे मन में यह सवाल उठता है कि जन्माष्टमी कब होगी । होली-दीवाली कब मनाई जाएगी । इस पर उज्जैन, बनारस, प्रयाग के विद्वानों से राय ली जाती है पर इस मामले में अयोध्या का नाम क्यों नहीं आता । उनकी मानें तो इसकी वजह यहां मंदिर आंदोलन के चलते इस तरह के फोरम का न बन पाना है । जहां से लोग अपनी शंकाएं दूर करने के लिए संपर्क करें । हालांकि यहां रामकथा के मर्मज्ञों की तादाद कम नहीं है । संस्कृत के पठन-पाठन के क्षेत्र में यह शहर पीछे नहीं है(योगेश मिश्र,संडे नई दुनिया,10-16 अक्टूबर,2010)

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