विद्या धनम् सर्व धनम् प्रधानम् ।
या विद्या साविमुक्तए ।
विद्या दानम् महादानम् ।
इन दिनों औद्योगिक शहर कानपुर में इन जुमलों पर अमल करने का एक लंबा सिलसिला चल पड़ा है । इसके मद्देनजर इस औद्योगिक नगरी में विद्या दानियों की भीड़ देखते ही बनती है । दिलचस्प तो यह है कि विद्या दान करने वालों की कतार में आने के लिए सरकार के महत्वपूर्ण पदों से रिटायर हुए लोगों के साथ-साथ ऐसी महिलाओं ने भी रुचि दिखाई है जो बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल कर कल तक अपने पति के साथ कारोबार में हाथ बंटाती थीं । इस अभियान के जनक भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी मुकेश मेश्राम को यह जुनून उस समय सवार हुआ जब वह अपनी सरकारी गाड़ी से गुजर रहे थे और एक कॉन्वेंट स्कूल की बस ने प्राथमिक पाठशाला से निकले बच्चों पर सड़क पर इकट्ठा हुए गंदे पानी की छींटें इस कदर मारी कि कुछ बच्चे आंखें तरेर कर बस को घूरने लगे। किस पर ज्यादा छींटें पड़ी, इसे लेकर बच्चे अपने दर्द को बहलाने के लिए हास-परिहास करने लगे । उसी समय मेश्राम के दिमाग में आया कि अगर प्राथमिक पाठशाला के बच्चे भी स्कूल ड्रेस में होते तो शायद बस में बैठे बच्चों को ड्राइवर पर नाराज होने का मौका मुहैया कराते ।
उसी समय मेश्राम ने ठाना कि प्राथमिक पाठशालाओं के बच्चों की स्थिति सुधारी जानी चाहिए । इसके मद्देनजर उन्होंने "एकलव्य योजना" को जमीन पर उतारा । इसके तहत सबसे पहले शहर के प्राथमिक पाठशालाओं में पढ़ने वाले बच्चों की गणना की गई जो लगभग २४ हजार के आसपास है। कानपुर शहर के ४५० स्कूलों में २७५ अध्यापक इन बच्चों को तालीम देते हैं । यहां भी बड़ी विसंगति यह है कि इन अध्यापकों में अधिकतर प्रधानाध्यापक हैं जो अध्यापन से अधिक प्रशासनिक कार्यों के लिए खुद को ज्यादा उत्तरदायी मानते हैं । एकलव्य योजना के प्रथम चरण में तीन महत्वपूर्ण बिंदु रखे गए । पहला, विद्या दान- इसके लिए शहर की पढ़ी-लिखी गृहिणियों तथा सेवानिवृत्त अधिकारियों को आमंत्रण भेजा गया जिसका इस कारोबारी शहर में गर्मजोशी से इस्तकबाल हुआ ।
विद्या दानी दीपा शुक्ला ने एमबीए और एलएलबी के साथ-साथ कंपनी सचिव की भी पढ़ाई कर रखी है । बावजूद इसके उन्होंने कोटक महिंद्रा में उप प्रबंधक के पद को अलविदा कहकर विद्या दानी बनना कुबूल किया । वह बताती हैं, "सालाना पांच लाख का पैकेज था । पति का अपना कारोबार है । जिलाधिकारी मुकेश मेश्राम की इस योजना ने इस कदर प्रभाव डाला कि नौकरी छोड़ पूरा जीवन विद्या दान में लगाने का संकल्प ले लिया । नौकरी छोड़ने पर घर में विरोध भी हुआ । आर्थिक तंगी भी झेली लेकिन बड़े हौसले के सामने यह गौण हो गया । अब पूरा जीवन उनको रोशनी देने का संकल्प लिया है । जहां जड़ों तक सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है ।"
कुछ इसी तरह अपना जज्बा कानपुर निवासी प्रीति वर्मा भी बयान करती हैं । वह कहती हैं कि अब पूरा जीवन समाज के उन लोगों को समर्पित है जो विकास की रोशनी से दूर हैं । अब "एकलव्य योजना" को चलाना हम कानपुर बाशिंदों की परीक्षा का प्रश्न है । कुमारी अंजुम के पिता वायुसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। "एकलव्य योजना" से पहले वह पास-पड़ोस के गरीब बच्चों को पढ़ाती रही हैं । बताती हैं कि मन में कुछ करने की हसरत थी पर इस हसरत को प्लेटफार्म "एकलव्य योजना" से व्यापक तौर पर मिला है । महिला आयोग की पूर्व सदस्य रीना शर्मा और रसायन विज्ञान में स्नातकोत्तर करने वाली अर्चना यादव भी विद्या दानी बनकर गौरव का एहसास कर रही हैं ।
इस योजना में इस तरह की सैकड़ों महिलाओं के अलावा तकरीबन चार सौ सेवानिवृत्त लोगों ने रुचि दिखलाई । विद्या दानी बनकर इन लोगों ने प्राथमिक पाठशालाओं में बच्चों को तालीम देने की शुरुआत कर दी । धीरे-धीरे कारवां इस कदर आगे बढ़ा कि कई सेवानिवृत्त अधिकारियों ने तो इनमें से ४५ विद्यालयों को गोद ले लिया । उन विद्यालयों के बच्चों की जरूरतें ये अधिकारी अपनी पेंशन से पूरी करने लगे । कल तक जिनका समय नहीं कटता था अब इन स्कूलों में नन्हे-मुन्नों के बीच इनके समय को मानो पंख लग गए हैं । विद्या दानियों के चलते न केवल पढ़ाई-लिखाई और बच्चों का पहनावा दुरुस्त हुआ है बल्कि मिड-डे-मील की गुणवत्ता में भी सुधार आया । "एकलव्य योजना" का दूसरा पायदान प्राथमिक पाठशाला में आने वाले बच्चों के लिए किताबें, बैग और ड्रेस जुटाना था । इसके लिए वस्तु दान के तहत लोगों से अपील की गई । इसमें एक बच्चे पर तीन सौ रुपए का खर्च तय हुआ । इस धनराशि से बच्चे को फुल पैंट-शर्ट के साथ-साथ जूता-मोजा, तीन नोटबुक, वाटर प्रूफ स्कूल बैग, पेंसिल बॉक्स, कलर बॉक्स और आर्ट की कॉपी ही नहीं, गीता प्रेस से छपी हुई किताब "वीर बालक" और "वीर बालिका" का सेट भी दिया जाता है ।
अब तक कानपुर के लोगों ने पहल करके प्राथमिक पाठशालाओं के तकरीबन १२ हजार बच्चों को यह सामग्री मुहैया करा दी है । "एकलव्य योजना" का तीसरा और महत्वपूर्ण चरण आरोग्य दान है । इसमें आईएमए तथा निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों को इस बात के लिए तैयार किया गया कि वे इन प्राथमिक पाठशालाओं के बच्चों की सेहत की जांच-परख महीने में एक बार जाकर करें । इन बच्चों का हेल्थ कार्ड बनाया गया । हेल्थ चेकअप के दौरान पाई गई बीमारियों को ठीक करने के लिए दवाओं का भी वितरण किया गया । अधिकतर बच्चों में आयरन और कैल्शियम की कमी थी जिससे उनकी नजर कमजोर हो गई थी । तमाम बच्चों के माता-पिता अपने लाडले और लाडली की नजर कम होने की वजह ही नहीं समझ पा रहे थे। उन बच्चों को चश्मा भी दिया गया । अब तो प्राइमरी पाठशालाओं के दिन बहुर गए हैं । यहां बच्चों के बीच में तमाम प्रतियोगिताएं होने लगी हैं(योगेश मिश्र,संडे नई दुनिया,10-16 अक्टूबर,2010) ।

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