भारत की एक ऑटोमोबाइल कंपनी ने 2007 में अमेरिका के एक विशेषज्ञ को अपनी शोध एवं विकास इकाई का प्रमुख बनाया। हालांकि उस विशेषज्ञ को जल्दी ही आभास हो गया कि उनसे एक हाइब्रिड कार की योजना पर काम करने की उम्मीद की जा रही है, न कि शोध एवं विकास के व्यापक पहलू पर। उन्होंने यह समझाने की बहुत कोशिश की कि भारत में अभी ऐसी कार के लिए माहौल नहीं बना है, लेकिन उनकी कोशिश बेकार गई।
कुछ ही महीनों में उन्होंने इस्तीफा दे दिया, लेकिन रुखसती के वक्त कंपनी के प्रबंधन से हुई बातचीत (एग्जिट इंटरव्यू) में उन्होंने दो टूक लहजे में कह दिया था कि हाइब्रिड कार बनाने की कंपनी की योजना नुकसानदेह साबित होगी। ऑटो कंपनी ने इस घटना के कुछ ही समय बाद एक सर्वेक्षण कराया जिससे पता चला कि हाइब्रिड कार का वक्त वाकई अभी नहीं आया है।
लिहाजा इसकी योजना को अगले 3 साल के लिए टाल दिया गया। ऑटो उद्योग के एक विशेषज्ञ का कहना है कि कंपनी ने यह सर्वेक्षण एग्जिट इंटरव्यू में विदेशी अधिकारी की राय देखते हुए ही कराया था। तकरीबन हर कंपनी में एग्जिट इंटरव्यू का रिवाज है, लेकिन इसमें जताई गई राय को प्राय: इस्तीफा देने वाले अधिकारी या कर्मचारी की भड़ास के रूप में ही देखा जाता रहा है।
सौभाग्य से अब नजरिया बदल रहा है और ऑटो कंपनी से जुड़े इस उदाहरण सहित कई मामले यह बताते हैं कि एग्जिट इंटरव्यू महज औपचारिकता नहीं रह गए हैं। पिछले 4-5 साल में कुशल कर्मचारियों को जोड़े रखने के फायदों और नई नियुक्ति पर बढ़ते खर्च को देखते हुए कंपनियों ने विदा लेते कर्मचारी के 'अंतिम' साक्षात्कार के जरिए सामने आई बातों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है।
टाइटन के मुख्य मानव संसाधन अधिकारी एस रामदास का कहना है, 'कुछ एग्जिट इंटरव्यू से हमें पता चला कि कामकाजी महिलाओं को शाम 7 बजे के बाद ऑफिस में रुकने में दिक्कत होती है, लिहाजा अगले साल से हम अपने यहां कामकाज के समय में और लचीलापन लाएंगे।' ऐसा नहीं है कि एग्जिट इंटरव्यू से मिली राय के चलते टाइटन ने पहली बार नीतिगत बदलाव किया है। पिछले साल कंपनी ने एक एजुकेशन पॉलिसी पेश की जिसके तहत कमर्चारी बीआईटीएस-पिलानी से एमएस/एमबीए की पढ़ाई कर सकते हैं।
ट्रैवल पॉलिसी से लेकर वेतन के पैकेज में बदलाव तक, एग्जिट इंटरव्यू से कंपनियों को अपनी सूरत बदलने में हमेशा मदद मिली है। रामदास ने कहा, 'इससे संगठन को अपनी नीतियों पर दोबारा गौर करने और जमीनी हकीकत जानने में मदद मिलती है।' उद्योग जगत के विशेषज्ञों का कहना है कि एग्जिट इंटरव्यू में पूछे जाने वाले सवालों में भी बदलाव आया है। 'आप कंपनी क्यों छोड़ रहे हैं?' के बजाय 'अगर आप हमारी प्रतिद्वंद्वी फर्म में होते तो आपका कामकाज किस मायने में अलग रहा होता?' जैसे सवाल पूछे जाने लगे हैं।
ऐसे बदलावों से एचआर टीम को प्रतिस्पर्द्धा और बाजार की नब्ज समझने में मदद मिलती है। इंफोसिस के एचआर हेड मोहनदास पई का मानना है कि 'कर्मचारी की विदाई की बेला पर उससे होने वाली बातचीत से कंपनी के बारे में ईमानदार राय मिलती है और इन इंटरव्यू को जिस तरह से देखा जाता है, उससे पता चलता है कि कंपनी की कार्य-संस्कृति कैसी है।'
कुछ संगठनों में कर्मचारी के बॉस के बजाय बिजनेस मैनेजरों को एग्जिट इंटरव्यू लेने का जिम्मा सौंपा जाता है ताकि बेहतर फीडबैक मिल सके। कुछ कंपनियों ने तो एग्जिट इंटरव्यू का जिम्मा बाहरी एजेंसियों को देना शुरू कर दिया है। एग्जिट इंटरव्यू के आधार पर कंपनियों की ओर से उठाए गए कदमों की सराहना पूर्व कर्मचारी भी करते हैं।
एमफेसिस के साथ 2002 तक टीम मैनेजर के रूप में काम कर चुके और अब सैंटॉन चेज इंटरनेशनल में कंसल्टेंट समीर कराई बताते हैं कि अपने एग्जिट इंटरव्यू में उन्होंने अपने रिपोर्टिंग हेड से कहा था कि कर्मचारियों के ढीले रवैये के कारण कामकाज का माहौल अच्छा नहीं बन पाता है। एमफेसिस ने कराई को अगले छह महीने के लिए रोक लिया और इस अवधि में कराई ने पाया कि उनकी जताई गई राय के कई बिंदुओं पर कंपनी ने कदम उठाए(देविना सेनगुप्ता,इकनॉमिक टाइम्स,बंगलोर,12.8.2010)।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।