सुषमा हँसमुख है। सबसे मिल-जुलकर रहती है। सबके काम आती है तो उसके ऑफिस में आते ही सभी मुस्कुराकर उसका स्वागत करते हैं। उसकी अनुपस्थिति सभी को खलती है, वहीं शोभा स्वयं भी सदा कु़ढती है, किसी न किसी बात से असंतुष्ट रहती है व जब भी बात करती है असंतोष व कुंठा का जहर ही उगलती है। उसके सामने कोई गलती से कुछ कह दे तो अपनी तरफ से नमक-मिर्च लगाकर ऐसा बखान करती है जिससे दो व्यक्तियों के बीच झगड़ा व मनमुटाव गलतफहमियों हो ही जाती हैं। इसलिए सब उसके आते ही सतर्क हो जाते हैं। उसके ऑफिस में गिने-चुने लोगों को छोड़ किसी से संबंध अच्छे नहीं रह पाते। इसका कारण है उसका व्यवहार।
वर्क प्लेस पर कुछ सतर्कता व सावधानियाँ बरतें, संयम रखें, मधुर वाणी से व अपने संयत व्यवहार से सबसे सहजता का व्यवहार करें तो हम स्वयं भी खुशी व प्रसन्नाता के एहसास से भरे रहेंगे साथ ही माहौल अच्छा बना रहे तो सकारात्मक ऊर्जा कार्य को अधिक श्रेष्ठता प्रदान करेगी। कुछ बिंदुओं पर मनन करें व उन्हें उदारता से अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।
खुद को सर्वश्रेष्ठ न समझें
अक्सर कई लोग यह गलतफहमी पाल लेते हैं कि मैं जैसा हूँ या करता हूँ वही ठीक है या मुझे ही हर बात का सबसे अधिक ज्ञान है या मेरे विचार ही सही हैं। ऐसी गलतफहमी आपके अहम् को बढ़ाती है, जो रिश्तों के लिए सबसे अधिक घातक है।
दृढ़ता और शांति जरूरी
कई बार ऐसी स्थितियाँ निर्मित होती हैं जब आपको अपना मत व्यक्त करना होता है, चाहे वह कोई साधारण बात हो या पॉलिसी निर्धारण। ऐसे में अपनी राय दृढ़ता से देने का जज्बा रखें (सब जैसा ठीक समझें वाला पलायनवादी दृष्टिकोण नहीं) लेकिन स्वर व शब्द संयत हों।
संयमित रहें
वर्क प्लेस पर किसी से मतभेद हों भी तो इसे स्वाभाविक प्रक्रिया समझते हुए वाणी का संयम न खोएँ।
उचित शब्दों का चयन
चाहे मजाक हो या कोई गंभीर वार्तालाप, वाणी के साथ ही शब्दों का चयन बहुत सोच-समझकर करें अन्यथा अर्थ का अनर्थ होने में देर नहीं लगती।
व्यक्तिगत आक्षेप न लगाएँ
कई बार चर्चाओं के दौरान हम "पर्सनल कमेंट" कर बैठते हैं जिससे दूसरा आहत हो सकता है। ऐसी अप्रिय स्थिति उत्पन्ना न होने दें।
व्यक्तिगत कुंठा व्यक्त न होने दें
कभी-कभी हमारे कुछ व्यक्तिगत फ्रस्टेशंस या शिकायतें होती हैं। हमारे वे दुख हमारे अपने हैं उन्हें व्यक्त कर हम अपनी ही हँसी उड़वा लेते हैं। परिस्थितियाँ सदा एक-सी नहीं रहतीं यह दृढ़ विश्वास रखते हुए अपने व्यवहार में संयम रखें।
गलतफहमियाँ न पालें
बिना उचित प्रमाण के दूसरों के बारे में, उनके स्वभाव के बारे में गलतफहमी पालकर हम स्वयं बेकार ही परेशान होते हैं। ऐसा करने से बचें।
सबसे बैर न पालें
कुछ लोग मानकर ही चलते हैं कि सभी बुरे हैं, उनके दुश्मन हैं। इस प्रकार की नकारात्मक सोच से सभी से बैर का भाव जन्म लेता है व किसी पर भी विश्वास न कर पाने से हम स्वयं दुखी व असंतोषी बन जाते हैं।
पीठ पीछे बुराई न करें
अक्सर झगड़ों की जड़ पीठ पीछे की गई निंदा होती है। अतः जो कहना हो सामने कहें अन्यथा न कहें।
चुगलखोरी न करें
कुछ लोगों की आदत होती है कि एक से निकटता स्थापित करने के लिए दूसरे की कही बात अपनी ओर से नमक-मिर्च लगाकर बताते हैं। ऐसे लोगों की बातों पर ध्यान न दें व स्वयं भी यह कभी न करें।
रोकर अपनी बात न कहें
कई बार अपनी बात को कहते समय कई स्त्रियाँ भावुक हो जाती हैं व रोने लगती हैं। रोकर स्वयं को सही साबित करने की कोशिश आपको हास्यास्पद बनाती है। अतः भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीखें।
इसके अलावा कुछ सकारात्मक तरीकों से आपका बड़प्पन बढ़ सकता है, जैसे-
हमेशा दूसरों के काम आने का बड़प्पन दिखाएँ।
सुख-दुःख में सहभागी बनें।
टीम वर्क में विश्वास रखें।
बड़ों को सम्मान दें व छोटों से स्नेह रखें।
दूसरों से सीखने को तैयार रहें, चाहे वह उम्र व ओहदे में छोटा ही क्यों न हो?
दूसरों की भावनाओं का आदर करें।
सहयोगियों की सफलता व उन्नाति से प्रसन्ना होने की मानसिकता विकसित करें।
साथियों की खुले मन से प्रशंसा करना सीखें।
मतभेद होने पर भी संवाद स्थापित कर संबंधों को सहज बनाएँ।
हमेशा रिश्तों को सर्वोपरि समझकर उन्हें बनाए रखने व उनकी गरमाहट कायम रखने का प्रयास करें।
इसके साथ ही सहयोगियों से विशेषकर पुरुष सहकर्मियों से एक गरिमामय दूरी बनाए रखना, पहनावे को पद की गरिमा व गौरव बनाए रखते हुए शालीनता के दायरे में रखना व अपनी सोच को सकारात्मक बनाए रखने का सतत प्रयास ही वर्क प्लेस पर भी आपको सुखद एहसास से भरा रखेगा(साधना सुनील विवरेकर,नायिका,नई दुनिया,13.10.2010)।
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