त्रिभाषा सूत्र योजना के अन्तर्गत विभिन्न मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों के लिए हताश करने वाली खबर है। प्रदेश सरकार ने बेसिक शिक्षा विभाग की त्रिभाषा सूत्र योजना खत्म कर दी है। अब मान्यता प्राप्त विद्यालयों में त्रिभाषा के अन्तर्गत कार्यरत शिक्षकों के वेतन के लिए प्रदेश सरकार कोई अनुदान नहीं देगी। ऐसी स्थिति में इन शिक्षकों को विद्यालय प्रबंधन पर आश्रित होना पड़ेगा। तकरीबन 47 साल पुरानी त्रिभाषा सूत्र योजना के अन्तर्गत अनुदान रोकने का यह आदेश प्रदेश सरकार के सचिव अनिल संत ने जारी किया है। सरकार ने यह निर्णय उत्तर प्रदेश सरकार बनाम अनीता त्यागी के मामले में नौ अगस्त 2010 को पारित उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुक्रम में लिया है। हाईकोर्ट ने इस निर्णय में राज्य सरकार को गैर अनुदानित विद्यालयों के शिक्षकों को त्रिभाषा सूत्र के अन्तर्गत वेतन के मामले में निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी थी। शासन ने विचार किया और माना कि निजी प्रबंधतंत्र के अधीन बेसिक शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त गैर अनुदानित विद्यालयों के अध्यापकों के वेतन का दायित्व राज्य सरकार पर नहीं है। सरकार ने माना कि त्रिभाषा सूत्र योजना जब शुरू की गई थी तब स्कूल और शिक्षकों की कमी थी लेकिन अब सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत एक किलोमीटर पर प्राथमिक और दो किलोमीटर पर उच्च प्राथमिक विद्यालय स्थापित किए जाने से सभी विषयों के शिक्षण की समुचित व्यवस्था हो चुकी है। ऐसे में त्रिभाषा सूत्र योजना के अन्तर्गत राज्य सरकार द्वारा अलग से खर्च करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। मंडलीय सहायक शिक्षा निदेशक डॉ. पवन कुमार सचान ने बताया कि शासन का आदेश मिल गया है। इसके अनुपालन के लिए सभी बीएसए को निर्देश दिए जा चुके हैं। क्या है त्रिभाषा योजना त्रिभाषा योजना वर्ष 1963 में राज्य सरकार के आदेश दिनांक 16 मार्च 1963 पर प्रारंभ की गई थी। इसके अधीन विद्यालयों में हिंदी, अंग्रेजी के अतिरिक्त संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित कोई एक भाषा पढ़ाये जाने की व्यवस्था की गई। वर्ष 1963-64 में जब यह योजना प्रारंभ हुई थी तब जिला विद्यालय निरीक्षक ही जिले के विद्यालयों का प्रबंध करते थे। लेकिन बाद में इसे बेसिक शिक्षा अधिकारी के सुपुर्द कर दिया गया था(राजीव शर्मा, दैनिक जागरण,बरेली, १७.१०.२०१०)।
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