किसी भी भाषा की समृद्धि उससे जुड़ी बोलियों में निहित है। बोलियां जीवित रहेंगी तो भाषा का अस्तित्व भी बना रहेगा और बोलियों का जीवन उस क्षेत्र और उसके निवासियों पर निर्भर हैं जहां वह बोली जाती हैं।
यह बात एनसीईआरटी के निदेशक डॉ. जी.रवीन्द्र शुक्रवार को उदयपुर में एसआईईआरटी में भील भाषा विकास पर शुरू हुई कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में कही। भारतीय भाषा संस्थान मैसूर के तत्वावधान में आयोजित इस दो दिवसीय कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में निदेशक ने कहा कि बोलियों और भाषाओं को जीवित रखने के लिए सबसे उचित माध्यम शिक्षा है। यह प्रयास पहली कक्षा से ही शुरू हो जाना चाहिए। यदि बच्चे एकाघिक भाषाओं का ज्ञान रखेगा तो उसकी प्रतिभा ही बढ़ेगी। उन्होंने यह चिंता भी जताई कि अभी जो साहित्य स्थानीय बोलियों में लिखा जा रहा है, कुछ समय बाद उन्हें पढ़ने और समझने वाला कोई नहीं होगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जनजाति आयुक्त अपर्णा अरोड़ा ने भी बोलियों का संरक्षण जरूरी बताया और एसआईईआरटी को इसमें सक्रिय सहयोग देने को कहा। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि प्रारंभिक शिक्षा अतिरिक्त निदेशक कमलेश लट्ठा, भाषा संस्थान के निदेशक प्रो. राजेश सचदेवा, प्रो. जे.सी. शर्मा, एसआईईआरटी के भाषा विभाग की अध्यक्ष डॉ. पूर्णिमा शर्मा आदि ने भी विचार व्यक्त किए।
वागड़ी पर केंद्रित है कार्यशाला
-यह कार्यशाला वागड़ी बोली पर निर्भर है। आयोजकों ने बताया कि वागड़ी भी भीली भाषा से सम्बंघित बोली है जो उदयपुर के खेरवाड़ा से लेकर डूंगरपुर-बांसवाड़ा तक बोली जाती है। इसके बोलने वाले करीब 25 लाख लोग हैं। इसी कारण कार्यशाला में बांसवाड़ा-डूंगरपुर से अध्यापक प्रतिभागी बुलाए गए हैं(राजस्थान पत्रिका,उदयपुर,2.10.2010)।
चल पड़े जिधर दो पग डगमग, चल पड़े कोटि पग उसी ओर,
जवाब देंहटाएंपड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर।
नमन बापू!