अटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (एईआरबी) द्वारा डीयू से रेडियोएक्टिव मटीरियल यूज करने की इजाजत वापस लिए जाने के बाद यूनिवर्सिटी में रिसर्च व प्रैक्टिकल वर्क की रफ्तार थम सी गई है। बैन को हटवाने के लिए यूनिवर्सिटी ने कोशिशें शुरू कर दी है। डीयू रजिस्ट्रार राजेश कुमार सिन्हा और केमिस्ट्री डिपार्टमेंट के हेड प्रोफेसर ए. के. बख्शी दो दिन पहले मुंबई पहुंचे और वहां पर एईआरबी के अधिकारियों के सामने यूनिवर्सिटी का पक्ष रखकर बैन हटाने की अपील की।
वाइस चांसलर प्रो. दीपक पेंटल के मुताबिक, एईआरबी ने यूनिवर्सिटी को कुछ सुझाव दिए हैं जिन पर अमल किया जाएगा और पूरी उम्मीद है कि जल्द से जल्द बैन को हटा दिया जाएगा। जानकारी के मुताबिक, मुंबई पहुंची टीम ने डीयू जांच कमिटी की रिपोर्ट को एईआरबी के सामने रखा और सुधार के क्या-क्या उपाय किए जा रहे हैं, इसकी जानकारी भी दी। यूनिवर्सिटी सूत्रों का कहना है कि एईआरबी ने कहा है कि सबसे पहले वे उन रेडियोएक्टिव सोर्स को बोर्ड को वापस भेजें, जो प्रयोग में नहीं आ रहे हैं।
फिलहाल एईआरबी ने बैन हटाने का फैसला नहीं लिया है। डीयू की ओर से बताया गया कि किस तरह पोस्ट ग्रैजुएट लेवल पर स्टूडेंट्स की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है। सेशन निकल रहा है और वे प्रैक्टिकल नहीं कर पा रहे हैं। साथ ही, डीयू ने इंस्टिट्यूट ऑफ लाइफ लांग लर्निंग (आईएलएलएल) द्वारा लैब सेफ्टी के बारे में उठाए गए कदमों का भी विस्तार से ब्यौरा दिया। यूनिवर्सिटी टीम ने बताया कि लैब सेफ्टी के लिए पोस्टर निकाले गए हैं, स्टूडेंट्स को जागरूक किया जा रहा है और स्टाफ की ट्रेनिंग पर भी ध्यान दिया जा रहा है। केमिकल की पहचान के लिए खास सिंबल भी बनाए जा रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि एईआरबी ने डीयू द्वारा उठाए गए कदमों पर संतोष जाहिर किया है। डीयू को उम्मीद है कि स्टूडेंट्स के हितों को देखते हुए यह बैन जल्द हट सकेगा।
हाल ही में इग्जेक्यूटिव काउंसिल की मीटिंग में डीयू जांच कमिटी की रिपोर्ट रखी गई थी। रिपोर्ट में कमिटी ने पूरे केमिस्ट्री डिपार्टमेंट को गामा सेल को बेचने का जिम्मेदार ठहराया था। साथ ही, कहा गया है कि ऑक्शन से पहले कमिटी एईआरबी को लिस्ट भेजे और बोर्ड की इजाजत के बिना ऑक्शन न हो। इसके अलावा फैकल्टी मेंबर्स और टेक्निकल स्टाफ को भाभा अटॉमिक रिसर्च सेंटर की ओर से करवाए जाने वाले कोर्स में शामिल होने को कहा जाए। जिन डिपार्टमेंट में रेडियोएक्टिव मटीरियल यूज होता है, उनमें से हर एक में सेफ्टी ऑफिसर्स नियुक्त किया जाए। हर साल एईआरबी को स्टेटस रिपोर्ट भेजी जाए। यूनिवर्सिटी इन सभी सुझावों को मानने के लिए तैयार है।
कोबाल्ट 60 मामले में डीयू की ढिलाई के चलते एईआरबी ने डीयू को रेडियोएक्टिव मटीरियल यूज करने से रोक दिया था। इस रोक के बाद ही डीयू ने इग्जेक्यूटिव काउंसिल की मीटिंग बुलवाई और अब बैन हटवाने की कोशिशें की जा रही हैं। डीयू की जांच रिपोर्ट में किसी प्रोफेसर का नाम नहीं लिया गया है जिसके बाद यूनिवर्सिटी ने तीन मेंबर की एक और कमिटी बनाने का फैसला लिया है ताकि गामा सेल को कबाड़ में बेचे जाने के लिए जिम्मेदार प्रोफेसरों का नाम सामने आसके और यूनिवर्सिटी उनके खिलाफ कार्रवाई कर सके(भूपेंद्र,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,11.10.2010)।
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