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02 अक्टूबर 2010

बिहारःशिक्षा योजनाओं की बाढ़ में बाबुओं की चांदी

बिहार में जनता द्वारा सरकारी खजाने में जमा किया गए पैसे का बाबुओं ने जमकर उपयोग किया है। शिक्षा योजनाओं की बाढ़ में अफसरों और बाबुओं ने जमकर चांदी काटी। यह हकीकत जाननी हो तो क्षेत्रीय शिक्षा अधिकारी से लेकर उन प्राचार्यो की सुख-सुविधा का आकलन कीजिए, जो पांच साल पहले तक रिक्शे में चलते थे और आज लक्जरी वाहनों में फर्राटे भर रहे हैं। इन वाहनों से कार्यालय और विद्यालय में ऐसे शान से आते हैं कि मानो पांच साल के भीतर ही उन्हें कुबेर का खजाना हाथ लग गया हो। पिछले पांच सालों में शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी खजाने को कुछ इस तरह खर्च किया गया कि मानो शिक्षा में सरकार शत-प्रतिशत साक्षरता को हासिल कर लेना चाहती हो। विद्यालय भवन निर्माण, चारदिवारी निर्माण, कक्षा निर्माण, साइकिल योजना, पोशाक योजना, कंप्यूटर शिक्षा योजना, अक्षर आंचल योजना और साक्षरता मिशन समेत तमाम कार्यक्रमों की बाढ़-सी आ गई। जाहिर है कि इस तरह योजनाओं की बाढ़ आती है तो जनता को राहत पहुंचाने के नाम पर बाबूओं की भी चांदी कटती है। कुछ यही हाल शिक्षा में योजनाओं की आई बाढ़ में दिखी। पिछले पांच साल में बिहार में सत्तारूढ़ नीतीश कुमार की सरकार ने तो शिक्षा का विकास और विद्यार्थियों की सुविधा के लिए एक-एक विद्यालय को करोड़ों रुपये का आवंटन किया, किंतु इस राशि को खर्च करने में बाबूओं ने खूब चांदी काटी। सरकारी खजाने की लूट की आग में विद्यालयों के प्रबंध समितियों के सदस्यों ने भी जमकर हाथ सेंका। समितियों के अध्यक्ष और सचिव तक को पांच सालों में लक्जरी गाडि़यों का शौक हो गया। पब्लिक के पैसे का दुरुपयोग कुछ इस शातिर अंदाज में हुआ कि आडिट रिपोर्ट और उपयोगिता प्रमाण पत्र में भी ऊपर के अफसरों को कोई खामी नजर नहीं आई(दीनानाथ साहनी,दैनिक जागरण,पटना,2.10.2010)।

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