राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया ने निजी क्षेत्र में भी दलितों को आरक्षण की जोरदार वकालत की है। उन्होंने दलित मुसलमानों व दलित ईसाइयों को भी अनुसूचित जाति के लाभ दिए जाने का समर्थन किया, लेकिन साफ किया कि इस बारे में अकेले आयोग निर्णय नहीं कर सकता है। उन्होंने उत्तर प्रदेश में दलित अत्याचार निरोधक कानून का पूरी तरह पालन न होने पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि वहां पर हत्या व बलात्कार के अलावा और किसी अत्याचार पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही है। लोकनायक भवन स्थित आयोग के मुख्यालय में अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करते हुए पुनिया ने निजी क्षेत्र में दलितों को आरक्षण की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि आज निजी क्षेत्र जैसा कुछ नहीं है। इन कंपनियों की काफी हिस्सेदारी आम जनता के पास होती है। इसके अलावा यह कंपनियां भी सार्वजनिक क्षेत्र से कर्ज लेकर काम कर रही हैं। ऐसे में उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के कायदे-कानून मानने चाहिए। मुसलमान व ईसाई दलितों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने की सिफारिश के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि मुसलमानों में जाति प्रथा नहीं है, लेकिन जातियां हैं। इसलिए दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों के संबंध में न्यायोचित मांग का समर्थन करते हैं। पुनिया ने मिर्चपुर कांड पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि उन्होंने खुद इस मामले को संसद में उठाया था। खाप के नाम पर समानांतर सरकार चलाने पर रोक लगाने के लिए कानून बनना चाहिए। देश के विभिन्न हिस्सों में दलित उत्पीड़न पर पूनिया ने कहा कि दलितों का चाहे जहां भी उत्पीड़न हो रहा हो, हम उसकी निंदा करते हैं। उत्तर प्रदेश के बारे में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि वहां पर दलित अत्याचार निरोधक कानून पर पूरी तरह अमल नहीं हो रहा है। बलात्कार व हत्या के मामलों में ही कुछ कार्रवाई हो रही है। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार पर दलित कल्याण कोष का धन ठीक से खर्च न करने का भी आरोप लगाया और कहा कि राज्य सरकार ने कन्नौज व जालौन में दलित विशेष योजना से मेडिकल कॉलेज बनाए हैं, लेकिन उनका लाभ सभी लोगों को मिल रहा है। जबकि यह राशि केवल दलितों के कल्याण के लिए होती है। पूनिया ने साफ किया कि वह भले ही राजनीति से जुड़े हुए हैं, लेकिन इस संवैधानिक पद पर रहते हुए वह किसी बात को राजनीति की नजर से नहीं देखेंगे। आयोग का काम दलितों के कल्याण के लिए काम करना व उन पर होने वाले अत्याचारों की समीक्षा करना है। इस बारे में योजना आयोग के जो दिशा निर्देश हैं उन पर राज्य अमल करें, इसे आयोग देखेगा। आयोग के ढांचे को मजबूत बनाया जाएगा और क्षेत्रीय कार्यालयों की संख्या बढ़ायी जाएगी(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,16.10.2010)।
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