भविष्य सुरक्षित हो तो मैनेजरी से मास्टरी भली है। शायद यही वजह है कि छात्रों में एमबीए का आकर्षण कम हो रहा है। इस साल यूपीटीयू से जुड़े एमबीए संस्थानों में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या को देखकर तो कम से कम यही लगता है। संस्थानों में दो तिहाई सीटें खाली रह गई हैं। कुछ संस्थानों में तो इस बार दाखिला लेने वालों की संख्या वहां पढ़ा रहे फैकल्टी सदस्यों से भी कम है। प्रदेश में छात्र बीटीसी और बीएड को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं, ताकि कम से कम नौकरी तो मिल ही जाएगी।
जिले में इस समय प्रबंधन (एमबीए) के 23 संस्थान हैं। इनमें लगभग 1500 सीटें हैं। इस साल यूपीटीयू से मान्यताप्राप्त सभी इंजीनियरिंग कॉलेजों के साथ कुछ नए कॉलेजों को भी एमबीए की कक्षाएं चलाने की भी मान्यता मिली है। एक संस्थान में एमबीए की 120 सीटों तक की मान्यता मिली है, पर इस साल प्रवेश मात्र सात छात्रों ने ही लिया है। जानकार इस बदलाव को बाजार की मंदी से जोड़कर देखते हैं। करियर चुनने के पीछे असल चिंता भविष्य की सुरक्षा को लेकर होती है। एमबीए की डिग्री हासिल करने के बाद भी नौकरी की गारंटी नहीं है। यूपीटीयू की काउंसिंलिंग में आईईआरटी के नोडल अधिकारी रहे एससी रोहतगी कहते हैं कि छात्र और अभिभावक बाजार में छाई मंदी के कारण एमबीए में प्रवेश को कम तरजीह दे रहे हैं। छात्र बीटीसी को तरजीह दे रहे हैं। बीटीसी को पूरा करने के बाद नौकरी मिल जाएगी, जबकि इन एमबीए इंस्टीट्यूट से डिग्री लेने के बाद उन्हें पांच से छह हजार की नौकरी के लिए भी मारामारी करनी होगी(अमर उजाला,इलाहाबाद,10.10.2010)।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।