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25 नवंबर 2010

यूपीःरोजगार का अच्छा जरिया साबित हो रहा मौन पालन

गांवों में पढ़-लिखकर बेरोजगारी का दंभ भरने वाले युवकों के लिए सरल व सस्ता रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है, बशर्ते वे सुबह-शाम समय दे सकें। इससे लाखों रुपये से अधिक की आमदनी की जा सकती है। साथ ही जीवन स्तर भी सुधारा जा सकता है। यह कोई अजूबा नहीं बल्कि सोरांव तहसील के बढ़ैया गांव के एक गरीब परिवार में जन्मे अरविन्द पाण्डेय पुत्र राज नारायन ने अपनी हाईस्कूल की पढ़ाई क रते समय ही मधुमक्खी के छत्तों को पेड़ों से निकालकर शहद का सेवन करते-करते किताबों में पढ़ कर मौन पालन की लालसा बढ़ा ली। उसने सन 1997 में मौन पालन का प्रशिक्षण प्राप्त कर भारतीय स्टेट बैंक की कृषि विकास शाखा से अम्बेडकर विशेष रोजगार योजना‌र्न्तगत ऋण लेकर इस मौन पालन को बडे़ पैमाने पर बढ़ाया और आज कई कुंतल शहद का उत्पादन करने का महारत हासिल कर चुका है। जिला स्तर पर प्रशस्ति प्रत्र भी प्राप्त कर चुका है। इस संबंध में जागरण से बातचीत के दौरान अरविन्द पाण्डेय ने बताया कि इसमें उसे तीन हजार रुपये प्रति बाक्स खर्च आता है। इसमें एक रानी मक्खी होती है उसके पीछे एक हजार मक्खी एक बाक्स में रहती हैं। प्रति बाक्स 30 किलोग्राम शहद प्राप्त होता है जो बाजार में 150 रुपये प्रति किलो है। इसे व्यापारी को आपूर्ति किये जाने पर कम मूल्य मिलता है। इसके अधिक उत्पादन के लिए रबी की फसल काफी कारगर साबित होती है, जिसमें सरसों का फूल अधिक होने पर शहद का उत्पादन बढ़ता है। गर्मी में इन्हें चीनी का शरबत देना पड़ता है जिसके सहारे जिन्दा रहती हैं उस समय उत्पादन कम होता है। आने वाले समय में शहद का बहुत महत्व है(दैनिक जागरण,सोरांव-इलाहाबाद,24.11.2010)।

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