उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने विश्वविद्यालयों में हो रहे शोध को लेकर जो सवाल उठाए वे चकित करने वाले हैं। यह आश्चर्यजनक है कि राज्य के सिर्फ एक विश्वविद्यालय में साढ़े चार हजार से अधिक शोध हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि विश्वविद्यालय डाक्टरेट की डिग्री बांटने के भी कारखानों में तब्दील हो गए हैं। यह तो जगजाहिर है कि जो शोध कार्य हो रहे हैं उनमें गुणवत्ता का अभाव है, लेकिन यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि स्थिति इतनी अधिक गंभीर हो चुकी है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध के नाम पर जो खानापूरी हो रही है वह एक तरह से खुद को और समाज को धोखा देने के समान है। राज्यपाल ने यह बिल्कुल सही सवाल उठाया कि विश्वविद्यालयों में जो शोध कार्य हो रहे हैं वे अंतरराष्ट्रीय स्तर तो दूर, राष्ट्रीय स्तर के भी नहीं हैं। यदि इन शोध कार्यो की सही तरह जांच पड़ताल की जाए तो वे विश्वविद्यालय शिक्षा के स्तर के भी नहीं हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि शोध करने-कराने का काम ठेकों पर हो रहा है। ऐसा नहीं है कि विश्वविद्यालय प्रशासन नकल और ठेके के जरिए हो रहे शोध की समस्या से अवगत न हो, लेकिन वह सब कुछ जानते-बूझते हुए भी मौन धारण किए हुए है। यदि यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब शोध की डिग्रियां दुकानों में बिकने लगेंगी। समस्या केवल यह नहीं है कि विश्वविद्यालयों में स्तरहीन शोध हो रहे हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश में विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा का संपूर्ण ढांचा बेहद गया-गुजरा और अप्रासंगिक हो चुका है। विश्वविद्यालयों में जैसी शिक्षा प्रदान की जा रही है उसका कहीं कोई मूल्य नहीं। यह न तो छात्रों के व्यक्तित्व में सहायक बन रही है और न ही समाज को कुछ देने में। एक ऐसे समय जब भारत को युवाओं के देश के रूप में संज्ञा दी जा रही है तब विश्वविद्यालय की स्तरहीन शिक्षा और उनके शोध कार्य समाज की कुसेवा का ही आदर्श उदाहरण हैं। बेहतर हो कि राज्य सरकार उच्च शिक्षा के ढांचे में आमूल-चूल बदलाव की दिशा में आगे बढ़े(संपादकीय,दैनिक जागरण,11.11.2010)।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।