मंदी से बचने और बीमार अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए ब्रिटेन की सरकार तरह-तरह की कटौतियों के जो नए प्रस्ताव ला रही है उनमें भारत जैसे गैर-यूरोपीय देशों के विद्यार्थियों और अप्रवासियों पर भारी गाज गिरेगी, क्योंकि ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में पढ़ना और पढ़ाई के दौरान ब्रिटेन में रहना काफी महंगा होता जा रहा है, इसलिए सरकार जिस तरह से यूरोप से बाहर के देशों के अप्रवासियों की संख्या में कटौती करने जा रही है उससे अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के उसके प्रयास खटाई में पड़ जाएंगे।
सरकार के पास उन कामगारों को रोकने का कोई उपाय तो है नहीं जो यूरोपीय संघ के देशों से आते हैं, इसलिए उसे केवल गैर-यूरोपीय अप्रवासी ही अपनी अर्थव्यवस्था पर बोझ प्रतीत हो रहे हैं, लेकिन वह यह नहीं देख रही कि यही गैर-यूरोपीय विद्यार्थी यहां शिक्षा पाने के लिए भारी फीसें अदा करते हैं और यहां रहने, आने-जाने तथा खाने-पीने आदि के अन्य खर्चो के लिए भी काफी बड़ी रकम खर्च करते हैं। डेविड कैमरन सरकार को उसकी अप्रवासन संबंधी समिति माइग्रेशन एडवाइजरी कमेटी ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार को अप्रवासियों की संख्या में 50 प्रतिशत की कमी लाने के अपने लक्ष्य को पूरा करना है तो उसे गैर-यूरोपीय देशों के विद्यार्थियों की संख्या को आधा करना होगा। पिछले वर्ष लगभग एक लाख 96 हजार लोग ब्रिटेन आए थे, जिनमें अधिकतर विद्यार्थी थे। अन्य अप्रवासियों में कई तरह के लोगों के अलावा यहां बसे लोगों के परिवारों के नजदीकी रिश्तेदार भी थे। माइग्रेशन एडवाइजरी कमेटी चाहती है कि जो एक लाख 63 हजार गैर-यूरोपीय विद्यार्थी यहां आए उनमें सरकार भविष्य में 87 हजार की कटौती करे और जिस तरह से 55 हजार रिश्तेदार आए उनकी संख्या को भी अगले साल बेहद सीमित करे। कुल मिलाकर उसे इनकी संख्या में 80 प्रतिशत की कटौती लागू करनी चाहिए।
भारत आदि देशों के अलावा दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड से प्रति वर्ष लगभग 52-53 हजार लोग छुट्टियों में काम करने के लिए ब्रिटेन आते हैं। सरकार की इस सलाहकार समिति ने इस संख्या को घटाने की भी सिफारिश की है। ब्रिटेन की सरकार ने गैर-यूरोपीय देशों के अति कुशल विदेशी कामगरों के श्रेणी-1 और श्रेणी-2 नाम के दो विशिष्ट वर्ग बना रखे हैं और इन वगरें के अंतर्गत आने वाले लोगों को अंक अर्जित करने होते हैं। सलाहकार समिति का सुझाव है कि सरकार को इन दोनों वर्गो में भी क्रमश: 13 प्रतिशत और 25 प्रतिशत की कमी करनी चाहिए। अगले वर्ष अप्रैल मास से इन वगरें के कोटे लागू हो जाएंगे। ब्रिटेन में आने वाले कुल अप्रवासियों में वे कर्मचारी भी शामिल हैं जिनकी कंपनियां उनका यहां तबादला करती हैं। ऐसे अप्रवासी कर्मचारियों की संख्या को कम कराने के लिए उक्त सलाहकार समिति ने प्रस्ताव किया है कि सरकार उनके वेतनमान में वृद्धि करवाए, ताकि कंपनियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़े और वे उससे बचने के लिए अपने कर्मचारियों के ब्रिटेन में कम तबादले करेंगे।
वर्तमान में हर महीने यहां ऐसे लगभग 2500 कर्मचारियों का तबादला हो रहा है। वेतनमान में वृद्धि करने से एक तो कंपनियों का ख़र्च बढ़ जाएगा और दूसरे इतना अधिक वेतन पाने के योग्य कर्मचारी ढूंढना मुश्किल हो जाएगा। इसका कंपनियों और देश को जो नुकसान होगा, सरकार को उसकी परवाह नहीं। वैसे तो सन् 2004 के बाद से ब्रिटेन में काम-धंधे के उद्देश्य से आने वाले कामगारों की संख्या में हर साल कमी होती जा रही है, लेकिन इसी अवधि में विदेशी विद्यार्थियों की संख्या में बेहद बढ़ोतरी हुई है। शीघ्र ही सरकार अपनी नई अप्रवासन नीतियों की घोषणा करेगी, लेकिन उससे यहां की अर्थव्यवस्था को कितना धक्का लगेगा, शायद इस पर उसने विचार नहीं किया है। जो लोग यहां पढ़ने और काम करने आते हैं वे यहां की अर्थव्यवस्था में सकारात्मक योगदान करते हैं। वे यहां भारी टैक्स अदा करते हैं और नेशनल इंश्योरेंस के रूप में भी अपना हिस्सा अदा करते हैं, जबकि बदले में न वे यहां के भत्ता सिस्टम से कोई भत्ता लेते हैं और न ही स्वास्थ्य सेवाओं को छोड़कर अन्य कोई लाभ उठाते हैं।
माइग्रेशन एडवाइजरी कमेटी इस बात को स्वीकार करती है कि श्रेणी-1 और श्रेणी-2 में कमी कराने से यदि अगले 5 वषरें में 10,000 अप्रवासियों की कटौती की जाएगी तो इससे ब्रिटेन के सकल राष्ट्रीय उत्पाद यानि जीडीपी में 2 अरब 80 करोड़ पाउंड का घाटा होगा। प्रति व्यक्ति यह राशि लगभग 28 पाउंड बैठती है। तब उनकी संख्या में कमी क्यों की जानी चाहिए? यदि विश्वविद्यालयों की आय की दृष्टि से विचार करें तो भी सरकार की इस नई अप्रवासन नीति से उन्हें घाटा ही होगा। जो विद्यार्थी विदेशों से पढ़ने आते हैं वे स्थानीय विद्यार्थियों से लगभग तीन गुनी फीस अदा करते हैं। इसी वजह से ब्रिटिश विश्वविद्यालय अपने यहां विदेशी विद्यार्थियों को अधिक से अधिक प्रवेश देते हैं।
इस सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि ब्रिटिश विद्यार्थी उच्च शिक्षा पाने के लिए उतने लालायित भी नहीं हैं जितने भारतीयों और चीनियों जैसे विदेशी विद्यार्थी। अधिकांश स्थानीय विद्यार्थी छोटी-मोटी नौकरी करने लगते हैं। विदेशी विद्यार्थी शिक्षा पूरी करने के बाद बहुत बड़ी संख्या में अपने देशों को लौटना पसंद करते हैं, क्योंकि उनके अपने देशों में ब्रिटेन की तुलना में अच्छी नौकरी और ऊंचे वेतन पाने और पदोन्नति करने की संभावनाएं काफी बढ़ गई हैं। उनसे जितनी फीस वसूल की जाती है, विश्वविद्यालय उससे कम खर्च में उन्हें शिक्षा प्रदान करते हैं। अगर ऐसे विद्यार्थियों की संख्या में भारी कटौती की जाएगी तो विश्वविद्यालयों को कितना नुकसान होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है(डॉ. गौतम सचदेव,दैनिकजागरण,22.11.2010)।
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