मुख्य समाचारः

सम्पर्कःeduployment@gmail.com

24 नवंबर 2010

शिक्षा केंद्र के रूप में भारत

अब यह कोई बड़ी खबर नहीं रह गई है कि इंग्लैंड और अमेरिका मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए दुनिया के सबसे लोकप्रिय गंतव्य हैं। इसके विपरीत अब भारत मैनेजमेंट की पढ़ाई करने वालों के लिए एक चुनिंदा स्थान बनता जा रहा है। वैश्विक स्तर पर मैनेजमेंट स्कूलों में दाखिले के लिए जीएमएटी परीक्षा का संचालन करने वाली ग्रेजुएट मैनेजमेंट एडमीशन काउंसिल (जीएमएसी) द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार मैनेजमेंट की पढ़ाई के इच्छुक छात्रों के लिए दुनिया के १० शीर्ष वरीयता वाले गंतव्यों में भारत का स्थान चौथा है। स्पष्ट है कि यह भारत की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस उपलब्धि में हैदराबाद के इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस जैसे संस्थानों का बड़ा योगदान है, जिसे लंदन के फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा इस साल की शुरुआत में विश्व स्तर पर १२वां स्थान दिया गया था। इसके अलावा जीएमएटी परीक्षा के आधार पर अपने एक्जिक्युटिव प्रोग्राम में दाखिला देने वाले इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट्स की भी इस लोकप्रियता बढ़ाने में बड़ी भूमिका रही है। लेकिन भारत के प्रबंधन शिक्षा का केंद्र बनने का सबसे बड़ा कारण है, कम खर्च में गुणवत्ता वाली प्रबंधन शिक्षा मिलना। मैनेजमेंट की पढ़ाई के इच्छुक छात्रों को भारत में कम पैसा खर्च कर बेहतर शिक्षा मिल जाती है जबकि इंग्लैंड और अमेरिका में यह शिक्षा बहुत महंगी पड़ती है। विश्व में चौथा स्थान हासिल करना तो भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है ही, साथ ही बेहतर भविष्य का परिचायक भी है। दुनिया के तमाम छात्र जो मैनेजमेंट की पढ़ाई के इच्छुक हैं, अब पढ़ाई करने के लिए भारत भी आएंगे। यूरोपीय देश और अमेरिका को अगर छोड़ भी दिया जाए तो अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों के छात्रों के लिए भारत सबसे पसंदीदा बन सकता है। भारत सरकार और निजी प्रबंधन संस्थानों के लिए यह एक सुनहरा अवसर साबित हो सकता है। इसलिए उन्हें भविष्य को ध्यान में रखकर अपनी नीतियां और कार्यक्रम बनाने की जरूरत है। इससे शिक्षा के एक बड़े केंद्र के रूप में भारत की प्रतिष्ठा तो बनेगी ही, आर्थिक रूप से लाभ भी होगा। कहने का अर्थ है कि पैसा और प्रतिष्ठा दोनों का फायदा होगा। तो क्या शिक्षा के क्षेत्र में भारत की पुरानी प्रतिष्ठा लौटने वाली है, जब यहां तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और उदवंतपुरी जैसे विश्व-प्रसिद्ध विश्वविद्यालय हुआ करते थे और दुनिया भर के विद्यार्थी यहां पढ़ने आते थे?(संपादकीय,नई दुनिया,23.11.2010)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।