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17 दिसंबर 2010

राजस्थानःनिजी स्कूलों का कारोबार 7,000 करोड़ का

राज्य में निजी स्कूलों का कुल सालाना कारोबार करीब 7000 करोड़ रु. है। इनमें 63 लाख छात्र हैं।

सीबीएसई से जुड़े स्कूलों में तीन लाख छात्र हैं। इन स्कूलों का कारोबार 800 से एक हजार करोड़ रु. माना जा रहा है। शिक्षाविदों का मानना है कि खुद स्कूल भी अपने स्तर पर आरटीई में बच्चों को पढ़ाने के लिए पहल कर सकते हैं। रिसोर्स इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन राइट्स के अध्ययन के अनुसार राजस्थान बोर्ड से जुड़े निजी स्कूलों में छात्रों से वसूली जाने वाली फीस को जोड़ें तो स्कूलों की सालाना आय 4,800 से 6,000 करोड़ रुपए होती है।

संस्था के संयोजक विजय गोयल का तर्क है कि हर स्कूल आरटीई एक्ट की भावना को मानें और एक छोटी शुरुआत करें तो उन पर ज्यादा आर्थिक फर्क नहीं पड़ने वाला। पेरेंट्स वेलफेयर सोसायटी के दिनेश कांवट का कहना है कि सरकार की ओर से नियम जारी करने में देरी की जा रही है। ऐसे में नए सत्र में एक्ट को लागू करने के लिए निजी स्कूलों को भी आगे आना होगा।

शिक्षा विभाग व बोर्ड से संबद्ध निजी स्कूल
स्कूल: 26000
छात्र : 60 लाख
(प्रति छात्र 8—10 हजार रुपए सालाना शुल्क पर 4800 से 6000 करोड़ आय)

सीबीएसई स्कूलों की आय का गणित
स्कूलों की संख्या : 300
छात्र : 3 लाख
एक छात्र की सालाना फीस 24000 (प्रति माह 2 हजार के औसत से)

आय : 720 करोड़ रुपए
प्रवेश फीस को मिलाकर 800-1000 करोड़
(कंटेंट: रिसोर्स इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन राइट्स)

स्कूलों की आय का मुख्य जरिया: फीस, कुछ स्कूल अपने ऑडिटोरियम, खेल मैदान नियत दरों पर किराये पर देते हैं। टाई, बेल्ट, स्कूल ड्रेस, छात्र-छात्राओं को लाने-ले जाने के लिए वाहनों को भी ऑपरेट करते हैं।


नया स्कूल खोलने पर लागत: प्राथमिक स्तर तक के स्कूल पर न्यूनतम खर्च 30 लाख तक, (स्थान विशेष पर निर्भर)। संसाधनों के लिहाज से लागत और बढ़ सकती है। 

सामान्य सुविधाएं: 8 से 10 कक्षा कक्ष। प्रिंसिपल, टीचर्स रूम। खेल मैदान। लाइब्रेरी, अन्य सुविधाएं। 

मई से पहले नियम जारी होंगे: राज्य मंत्रिमंडल की दो दिन चली बैठक में प्रदेश में शिक्षा का अधिकार कानून की क्रियान्विति पर भी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने शिक्षा अधिकारियों को मई से पहले नियम जारी करने के निर्देश दिए हैं। बताया जा रहा है कि उन निजी स्कूलों को भी इस कोटे के तहत प्रवेश करने होंगे जो अपनी प्रवेश प्रक्रिया पहले ही पूरी कर चुके होंगे(मदन कलाल,दैनिक भास्कर,जयपुर,17.12.2010)।

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