सीबीएसई ने इस साल दसवीं के बोर्ड में पास-फेल को खत्म कर ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने का ऐतिहासिक फैसला लिया। साथ ही दसवीं बोर्ड को वैकल्पिक करने का निर्णय भी काफी महत्वपूर्ण रहा। ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने पीछे यह मंशा रही कि बच्चों के अंदर से फीसदी और नंबरों की गला काट प्रतिस्पर्धा पर लगाम लग सके। बच्चों को ग्लोबल वातावरण के लायक बनाने के लिए पहली बार विश्व के अलग-अलग देशों के स्कूलों से स्टूडेंट ग्लोबल एप्टिट्यूड टेस्ट की भी शुरुआत की गई। सभी स्कूलों में मेडिकल सुविधा शुरू करने पर भी पहल किया गया। सभी स्कूलों को आदेश दिया गया कि वे अपने यहां मेडिकल सुविधा शुरू करें और इसकी रिपोर्ट बोर्ड को भेजें। सीबीएसइ ने शिक्षा में सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए, जिससे स्कूली शिक्षा की गुणवता का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। बोर्ड ने इसी साल से पहली बार 11वीं कक्षा में मीडिया कोर्स लागू कर ऐसे बच्चों को खुश कर दिया जो 12वीं के बाद स्नातक में मीडिया कोर्स की पढ़ाई करना चाह रहे थे। कुछ खट्टी-मिठ्ठी यादों के साथ कुल मिलाकर स्कूली शिक्षा के लिए यह साल काफी बेहतर रहा। राजधानी में स्कूली शिक्षा में कुछ कलंक हर साल की तरह इस साल भी नर्सरी दाखिला ने लगाया है। काफी कोशिश के बाद भी नर्सरी दाखिला प्रक्रिया हमेशा विवादों में रही है। वैसे तो हर साल सरकारी नियंत्रण के बाद भी स्कूलों की मनमर्जी सहने को अभिभावक मजबूर थे। लेकिन इस बार दिल्ली सरकार ने ही स्कूलों को मनजर्मी करने अधिकार दे दिया है। अब स्कूल प्रशासन ही खुद दिशा-निर्देश बनाएंगे और नर्सरी में दाखिला प्रक्रिया को अपने तरीके से निर्धारित करेंगे। इससे एक बार फिर राजधानी में हंगामे की स्थिति बनेगी, सरकार, स्कूल और अभिभावकों में तकरार भी सामने आएगा। इसी के साथ सरकारी स्कूलों में बंटने वाली मिड-डे मील को खाने से कई स्कूलों के बच्चे अस्पताल पहुंच गए। मिड-मील डे मील की गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठने से दिल्ली सरकार हरकत में आई और इसी से उसने नई व्यवस्था की। इसमें अब माता-पिता, दादा-दादी के अलावा बच्चों के कोई भी अभिभावक स्कूल आकर मिड-डे मील की जांच पड़ताल ही नहीं बल्कि उस पर प्रतिक्रिया भी दे सकता है(दैनिक जागरण,दिल्ली,17.12.2010)।
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