केंद्र सरकार की उपेक्षा और अलंबरदारों के उदासीन रवैये के चलते देश-विदेश में लगभग 19 करोड़ लोगों के बीच बोली जाने वाली भोजपुरी आज अपनों के बीच ही बेगानी बन कर रह गई है। बिहार व उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों को मिलाकर भोजपुरी प्रदेश की कल्पना करने वाले राहुल सांकृत्यायन की सोच कई वर्षो बाद भी अपने हक की लड़ाई लड़ने को विवश हैं। युवा पीढ़ी जहां भोजपुरी के नाम पर मुंह बिचकाती है, वहीं पुरानी पीढ़ी भी इसे पज्री तरह अपनाने में हिचकने लगी है। देश ही नहीं, विदेशों में भी सम्मान पा चुकी भोजपुरी भाषा आज अपने ही देश में वह सम्मान नहीं पा सकी, जो दूसरी भाषाओं को हासिल है। इसके प्रति अलग-अलग नजरिये का ही प्रतिफल है कि तमाम कोशिशों के बावजूद भोजपुरी संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल होने से अब तक वंचित है। यही कारण है कि वर्षो से भोजपुरी के हक में आवाज बुलंद करने वाली सीवान जिले की त्रिमूर्ति इसकी मौजूदा स्थिति से दुखी हैं। भोजपुरी को शिखर तक पहुंचाने वाले अक्षयवर दीक्षित इसकी मौजूदा स्थिति से काफी खिन्न हैं। वर्ष 1949 में भोजपुरी कविता लोरी, हाली-हाली आ नीदिया निनरबन से.. और वियोग श्रृंगार में काहे मां बैठे मनवा मारि के डुमरिया गुजरी.. आदि के रचयिता श्री दीक्षित भोजपुरी कवि व साहित्यकार महेन्द्र शास्त्री की प्रेरणा से छात्र जीवन में ही भोजपुरी के उत्थान में जुट गये थे। भोजपुरी में निबंध साहित्य की कमी को देखते हुए इन्होंने इसे ही अपना कार्यक्षेत्र बनाने का विचार किया। स्थानीय डीएवी उच्च विद्यालय सह इंटर कालेज से शिक्षक पद से अवकाश प्राप्त कर चुके 80 वर्षीय दीक्षित जी हुस्सेपुर (गोपालगंज)के अंतिम राजा फत्तेबहादुर शाही पर गहन शोध के बाद भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम नायक लिखकर चर्चा में रहे। राजकीय मध्य विद्यालय कचहरी में शिक्षिका के पद पर कार्यरत श्रीमती बच्ची देवी भोजपुरी के उत्थान के लिए निरंतर कार्य करती आ रही हैं। मज्ल रूप से भोजपुरीकविता के माध्यम से अपनी बात रखने वाली बच्ची देवी ने वर्ष 1978 में पहली भोजपुरी कविता कबो-कबो कवि के धरतियो पे आवे के चाहीं के द्वारा पहली बार अपना कदम बढ़ाया। तब से अब तक निरंतर भोजपुरी से जुड़ी रहीं बच्ची देवी ने भिखारी ठाकुर की याद में 2009 में कटक(उड़ीसा)में विश्व के प्रमुख देशों रूस, चीन, फिनलैंड, अमेरिका, थाइलैंड, अर्जेटीना आदि के समक्ष भोजपुरी नाटक गबर घींचोर और राहुल सांकृत्यायन की जन्म शताब्दी पर नारी की दशा का मंचन कर जिले का नाम रोशन कर चुकी हैं। कहानी और कविता के माध्यम से भोजपुरी की सेवा में संलग्न प्रो. सुभाषचंद्र यादव ने अपने छात्र जीवन में वर्ष 1978 में नये वर्ष के अवसर पर बसिया कविता की रचना की। आगे चलकर बहिन की विदाई और भोजपुरी के मशहज्र कवि अनुरागी की मृत्यु से दुखी होकर कइसे जागी भाग भोजपुरिया के अब.. लिखकर भोजपुरी साहित्य के क्षेत्र में अपना कदम बढ़ाया। फिर तो यह क्रम निरंतर चलते हुए आज तक जारी है(अनीश पुरुषार्थी,दैनिक जागरण,सीवान,21.12.2010)।
लेकिन इसके बावजूद भी हिंदी बोलने वालो से ज्यादा संख्या भोजपुरी बोलने वालो कि हैं.
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