कोई भी भाषा जब मातृभाषा नहीं रह जाती है तो उसके प्रयोग की अनिवार्यता में कमी और उससे मिलने वाले रोजगारमूलक कार्यों में भी कमी आने लगती है। जिस अत्याधुनिक पाश्चात्य सभ्यता पर गौरवान्वित होते हुए हम व्यावसायिक शिक्षा और प्रौद्योगिक विकास के बहाने अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ाते जा रहे हैं, दरअसल यह छद्म भाषायी अंहकार है। क्षेत्रीय भाषाएं और बोलियां हमारी ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहरें हैं। इन्हें मुख्यधारा में लाने के बहाने इन्हें हम मारने का काम कर रहे हैं। लोकभाषाओं एव बोलियों में पारंपरिक ज्ञान का असीम खजाना होता है। ऐसी भाषाओं का उपयोग जब मातृभाषा के रूप में नहीं रह जाता है तो वे विलुप्त होने लगती हैं। सन् २१०० तक धरती पर बोली जाने वाली ऐसी सात हजार से भी ज्यादा भाषाएं हैं जो विलुप्त हो सकती हैं।
भारत में भी ऐसे हालात सामने आने लगे हैं कि किसी एक इनसान की मौत के साथ उसकी भाषा का भी अंतिम संस्कार हो जाए। २६ जनवरी, २०१० के दिन अंडमान द्वीप समूह की ८५ वर्षीया बोआ के निधन के साथ एक ग्रेट अंडमानी भाषा "बो" भी हमेशा के लिए विलुप्त हो गई। यह भाषा जानने, बोलने और लिखने वाली वह अंतिम थीं। इसके पूर्व नवंबर, २००९ में एक और महिला बोरो की मौत के साथ "खोरा" भाषा का अस्तित्व समाप्त हो गया। किसी भी भाषा की मौत सिर्फ एक भाषा की ही मौत नहीं होती, बल्कि उसके साथ ही उस भाषा का ज्ञान भंडार, इतिहास, संस्कृति आदि की भी मौत हो जाती है।
भारत सरकार ने उन भाषाओं के आंकड़ों का संग्रह किया है, जिन्हें १० हजार से अधिक संख्या में लोग बोलते हैं। २००१ की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार ऐसी १२२ भाषाएं और २३४ मातृभाषाएं हैं। भाषा-गणना की ऐसी बाध्यकारी शर्त के चलते जिन भाषा व बोलियों को बोलने वाले लोगों की संख्या १० हजार से कम है उन्हें गिनती में शामिल ही नहीं किया गया।
"नेशनल ज्योग्राफिक सोसायटी एंड लिविंग टंग्स इंस्टीट्यूट फॉर एंडेंजर्ड लैंग्वेजेज" के अनुसार हरेक पखवाड़े एक भाषा की मौत हो रही है। सन् २१०० तक दुनिया की सात हजार से भी अधिक भाषाओं का लोप हो सकता है। इनमें से पूरी दुनिया में सत्ताईस सौ भाषाएं संकटग्रस्त हैं। इन भाषाओं में असम की १७ भाषाएं शामिल हैं।
भारत की तमाम स्थानीय भाषाएं व बोलियां अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के कारण संकटग्रस्त हैं क्योंकि अंग्रेजी रोजगारमूलक शिक्षा का प्रमुख आधार बना दी गई है। इन कारणों से नई पीढ़ी मातृभाषा के मोह से मुक्त होकर अंग्रेजी अपनाने को विवश है। प्रतिस्पर्धा के दौर में मातृभाषा को लेकर युवाओं में हीनभावना भी पनप रही है। इसलिए जब तक भाषा संबंधी नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन नहीं होता तब तक भाषाओं की विलुप्ति पर अंकुश लगाना मुश्किल है(प्रमोद भार्गव,नई दुनिया,दिल्ली,21.12.2010)।
मुझे तो लगता है एक देश मे एक ही भाषा हो तो बहुत से लडाई झगडे जो इनके कारण होते हैं समाप्त हो जायेंगे। स्थानिये भाषायें तो बोली ही जाती रहेंगी। धन्यवाद।
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