इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि मान्यता प्राप्त गैर अनुदानित प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं के खिलाफ समादेश याचिका पोषणीय है किंतु इनके अध्यापकों को तबादला आदेश को चुनौती देने का अधिकार नहीं है। प्रबंध समिति को इन्हें एक कालेज से दूसरे कालेज स्थानान्तरित करने का अधिकार है। यह आदेश न्यायमूर्ति सुनील अम्बवानी तथा न्यायमूर्ति केएन पांडेय की खंडपीठ ने सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कालेज ककरी परियोजना, सोनभद्र के अध्यापक श्रेयस्कर त्रिपाठी की विशेष अपील को स्वीकार करते हुए दिया है। एकल न्यायपीठ ने अध्यापक के स्थानांतरण आदेश के खिलाफ याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि गैर अनुदानित प्राइवेट कालेजों के खिलाफ याचिका पोषणीय नहीं है। जिसे अपील में चुनौती दी गई। जिसे न्यायालय ने आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। न्यायालय ने कहा है कि सरकार, राज्य प्राधिकारियों के अलावा वैधानिक लोक कार्य कर रही प्राइवेट संस्थाओं के खिलाफ भी याचिका दाखिल हो सकती है। ऐसी प्राइवेट संस्थाओं के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत समादेश याचिका जारी की जा सकती है, क्योंकि 10 अगस्त 2001 व अधिनियम के उपबंध इन पर लागू होते हैं। भारतीयसंविधान के अनुच्छेद 21 ए एवं मुफ्त व अनिवार्य वाल शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के तहत गैर अनुदानित विद्यालयों पर अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के दायित्वाधीन ठहराया गया है(दैनिक जागरण,इलाहाबाद,2.12.2010)।
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