बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में प्रशासन और शिक्षा माफिया का गठजोड़ कितना तगड़ा है, इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि विवि प्रशासन हाईकोर्ट को पलीता लगाने में भी संकोच नहीं करता। दस्तावेजी जवाब भेजकर विवि अदालत के सामने तो अपनी छवि बना लेता है, लेकिन कालेजों से मिलीभगत कर हाईकोर्ट की अस्मिता को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। अंदर ही अंदर होने वाले इस करारनामे की भनक कार्य परिषद को भी नहीं लगने दी जाती। कुछ ऐसा ही कारनामा बीयू प्रशासन ने राजधानी के सुंदरदेवी और शंकरदयाल शर्मा नर्सिग कालेजों के छात्रों की बीएससी द्वितीय वर्ष की परीक्षा के मामले में दिखाया है। विवि ने 19 अक्टूबर को निर्णय लेते हुए इन दोनों कालेजों के छात्रों को 23 अक्टूबर में होने वाली परीक्षा में शामिल न करने का निर्णय लिया था। साथ ही प्रथम वर्ष की परीक्षा का रिजल्ट घोषित करने से भी साफ इंकार कर दिया था। विवि का सख्त रवैया देखते हुए शंकर दयाल शर्मा नर्सिग कालेज द्वारा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी गई थी। अदालत ने नोटिस भेजकर विवि से जवाब तलब किया, साथ ही अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को तय की। विवि ने अदालत के जवाब में भी यही सख्त रवैया अपनाए रखा। अदालत को भेजे आठ सूत्री जवाब में विवि ने स्पष्ट कर दिया कि कालेज के पास नर्सिग कालेज की मान्यता नहीं है। इनकी याचिका पूरी तरह से अवैध और खारिज करने योग्य है। इसके विद्यार्थियों का रिजल्ट नियमानुसार घोषित नहीं किया जा सकता। विवि द्वारा 22 अक्टूबर को अपना जवाब अदालत को भेज दिया गया। साथ ही 23 अक्टूबर से द्वितीय वर्ष की परीक्षा भी शुरू करा दी। विवि के जवाब के आधार पर अदालत ने 27 अक्टूबर को कालेजों की याचिका खारिज भी कर दी। मगर इसी बीच विवि ने कालेजों से मिलीभगत कर आनन फानन में 25 अक्टूबर को स्थायी समिति की आकस्मिक बैठक आयोजित कर अपना फैसला बदल डाला। अदालत को भेजे जवाब से उलट इसे पिछले सत्र के लिए अस्थायी संबद्धता भी दे दी। साथ ही द्वितीय वर्ष की परीक्षा में भी दोनों कालेजों के 40 छात्र-छात्राओं को शामिल भी कर लिया। चूंकि इस पूरी उठापटक में इन छात्रों का एक पेपर छूट गया था तो उसकी भी व्यवस्था अंतिम पेपर के बाद कर दी गई। इन दोनों कालेजों के लिए एक पेपर अलग से कराया गया। आश्चर्य की बात यह है कि दो दिन बाद हुई सुनवाई में विवि ने अदालत को यह बताना भी जरूरी नहीं समझा कि इन छात्रों को परीक्षा में शामिल कर लिया गया है। अब कानूनविद भी उस नियम को ढूंढ रहे हैं कि जिन छात्रों के प्रवेश को ही विवि ने अवैध मान लिया है तो उनकी सेकंड ईयर की परीक्षा कैसे हो सकती है(प्रवीण शर्मा,दैनिक जागरण,देहरादून,7.12.2010)।
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