सरकार ने भले ही प्रदेश के सकल नामांकन अनुपात जीईआर को ध्यान में रखकर बाहरी शैक्षणिक संस्थाओं के खिलाफ मुहिम का तीर छोड़ा हो, लेकिन इसकी आंधी में ऐसी-ऐसी डिग्रियां उड़ती नजर आई हैं, जो प्रदेश के नौजवानों के साथ धोखे के अलावा कुछ भी नहीं हैं। इसके साथ ही उजागर हुआ है शिक्षा के नाम पर फैलता-फूलता गंदा धंधा। मुहिम को अंजाम देने वालों को भी इस गंदगी का अंदाजा नहीं होगा। इनके उजागर होने से प्रदेश के विद्यार्थी सोचने पर विवश हुए हैं तो राज्य शासन को भी इन्हें भटकाव से बचाने लिए जल्द ही नए कदम उठाना पड़ेंगे। अपने बेश कीमती साल और लाखों रुपए देकर विद्यार्थी जो कोर्स कर रहे हैं, क्या उसकी डिग्री वैध है? निश्चित तौर पर प्रदेश के छात्र-छात्राओं के सामने आज यह सबसे बड़ा सवाल है। और इन विद्यार्थियों को उहापोह की स्थिति से उबारने की महती जिम्मेदारी राज्य शासन की है या यूं कहें कि अब शासन के सामने यह एक चुनौती है। इसकी वजह भी राज्य शासन से ही जुड़ी है। जिस सरकार की प्राथमिकता में शिक्षा की गुणवत्ता हो, उसके शासन में अवैध या फर्जी कोर्स कैसे चल सकते हैं। दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं। सरकार यदि शिक्षा की गुणवत्ता की बात करती है तो छात्र-छात्राओं और समाज को यह भी विश्वास दिलाना जरूरी है कि सभी कोर्स वैध हैं और कोई भी संस्थान फर्जी नहीं है। निश्चित तौर पर सरकार की यह मुहिम प्रदेश की शिक्षा की गुणवत्ता के प्रति विश्वास दिलाने वाली साबित होगी। इससे बाहरी संस्थाओं के चंगुल से छात्र मुक्त होंगे तो प्रदेश के संस्थाओं में प्रवेश का आंकड़ा भी बढ़ेगा। माना जाए तो इस मुहिम का मंतव्य यही आंकड़ा है। राज्य शासन को अपना जीईआर वर्ष 2013 तक बढ़ाकर 15 प्रतिशत है। अभी इंजीनियरिंग, डिप्लोमा, मेडीकल, पैरा मेडीकल सहित तमाम प्रोफेशनल और पारंपरिक कोर्स को भी अपनी सूची में शामिल करने के बाद भी बमुश्किल 12 फीसदी जीईआर दिखाया जा रहा है। इतना ही नहीं प्रथम वर्ष की बजाय द्वितीय, तृतीय और अंतिम वर्ष तक के छात्रों की भी गिनती कर ली गई है। इनमें वे छात्र भी शामिल कर लिये गए हैं, जिन्होंने अन्य राज्यों से आकर मध्यप्रदेश में प्रवेश लिया है। मगर इन बाहरी राज्यों के संस्थाओं के कारण प्रदेश को खासा नुकसान हो रहा है। एक तो इनके कारण प्रदेश के छात्रों का पलायन नहीं रुक पा रहा है। यह छात्र मप्र में ही रहने के बाद भी अन्य राज्यों के लिए राजस्व का जरिया बने हुए हैं। दूसरी ओर सबसे बड़ी बात यह है कि किसी तरह का फर्जीबाड़ा होने के बाद जिम्मेदारी शासन की होती है। यानि हमारा छात्र ज्यादा फीस देने के बाद भी शोषण का शिकार हो रहा है। इसका नुकसान भी प्रदेश को ही उठाना पड़ता है। इन संस्थाओं से डिग्री लेने के बाद ये छात्र सेवाएं प्रदेश में ही देते हैं। मुहिम में सामने आए विश्वेरैया संस्थान के संचालक की मानें तो प्रदेश में कार्यरत साठ फीसदी इंजीनियरों की डिग्री फर्जी है। इन सभी ने विश्वेरैया जैसे संस्थानों से ही कोर्स किया है। जबकि यह भी सच है कि छापे के दौरान कई छात्रों की डिग्रियां और इनकी रेट लिस्ट थैले में टंगी मिली हैं। अधिकांश संस्थाओं के पास प्रदेश में कोर्स चलाने का कोई प्रमाण-पत्र नहीं है। अदालत और डेक व यूजीसी के जिस अधिनियम की दुहाई यह संस्थान दे रहे हैं, उसी के तहत भोज विवि के केंद्र अन्य सभी राज्यों में बंद कराए गए हैं। ऐसे में राज्य शासन को अब आर-पार की लड़ाई लड़ना होगी। सूत्रों की मानें तो ऐसा कोई नियम नहीं है कि इन संस्थाओं के कोर्स मान्य किए जा सकें। जहां तक छात्रों की बात है तो सीधे स्कूलों से निकले छात्र नहीं जानते कि विश्वविद्यालय अधिनियम क्या होता है। कौन सा विश्वविद्यालय किस अधिनियम से बना है और किस अधिनियम की डिग्री वैध मानी जाएगी। खासकर शिक्षा को अपनी प्राथमिकता बताने वाले शासन के राज्य में तो यही विश्वास रहता है कि सब कुछ सही ही होगा। इस विश्वास को कायम रखने और प्रदेश को एजूकेशन हब बनाने के लिए सरकार को यह मुहिम दोगुनी शक्ति से चलाना होगी। इतना ही नहीं, इन संस्थाओं को बढ़ावा देने वाले अफसरों के खिलाफ भी शासन को हर समय कार्यवाही के लिए तैयार होना होगा।
अब तक क्यों था पर्दा
एक तरफ मध्यप्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय को अपने सारे सेंटर रातों रात समेटने पड़े। राज्य के एक्ट से संचालित होने के बाद भी इस विश्वविद्यालय को अपनी सारी गतिविधियां प्रदेश तक सीमित करना पड़ीं। अदालत के आदेश पर राज्य सरकार ने अपने विवि के सेंटर तो बंद कर दिए, बावजूद इसके प्रदेश में अन्य राज्यों के विवि इतने सालों तक कैसे चलते रहे? अदालत के आदेश का प्रदेश में पाल क्यों नहीं कराया गया। राजधानी में शासन-प्रशासन की नाक के नीचे यह सारे संस्थान सालों से डिग्री कैसे बेच रहे हैं। सरकार की इस मुहिम से यह एक सवाल जरूर खड़ा हो गया है। विभाग के अधिकारी अब तक शांत क्यों बैठे रहे, इन बाहरी विश्वविद्यालयों को प्रदेश में पैर पसारने का मौका किसने और क्यों दिया। बेशक, बाहरी संस्थानों पर सीधी कार्यवाही काबिले तारीफ हैं, लेकिन इन्हें बढ़ावा देने वालों की जिम्मेदारी भी शासन को तय करना होगी। वरना कोई गारंटी नहीं है कि शासन में बैठे अधिकारी ही इनके लिए नया रास्ता खोज दें और इन संस्थाओं को प्रदेश में डिग्री बेचने का लायसेंस थमा दिया जाए।
यहां भी कर ली कमाई
कालेज खुलवाने से लेकर हर परीक्षा के रिजल्ट तक अपने हिस्सा निकालने वाले निरीक्षण कर्ता सरकार की इस मुहिम से भी कमाई करने में पीछे नहीं रहे। इंदौर में हुआ भ्रष्टाचार तो राजभवन से लेकर मंत्रालय तक खुल चुका है। इसके चक्कर में इंदौर विवि के कुलसचिव परीक्षित सिंह पर कार्यवाही होना निश्चित है। श्री सिंह से सरकार कितनी नाराज है, वीडियो कांफ्रेंसिंग में पूरा प्रदेश देख चुका है। जब प्रमुख सचिव ने उन्हें बोलने की भी छूट नहीं दी। सूत्रों की मानें तो ऐसे कारनामे प्रदेश भर में हुए हैं। सरकार की मंशा को पूरा करने की बजाय अधिकारियों ने अपनी जेब भरने का कोई मौका नहीं छोड़ा। अधूरे मापदंडों का जमकर सौदा किया गया। बीएड की जांच में तो यह सौदेबाजी गली-गली में हुई। बताया जाता है कि बीएड कालेजों की जांच में ही कई शिक्षकों ने लाख का आंकड़ा पार कर लिया। शिक्षकों और अधिकारियों के यह कारनामों से यह बात भी साफ हो गई कि प्रदेश में कैसे खुलती और फलती-फूलती हैं शिक्षा की दुकानें।
दागियों को सौंपी कमान
वैसे देखा जाए तो अपनी इस मुहिम में सौदेबाजी की गुंजाइश खुद उच्च शिक्षा विभाग ने ही सौंपी थी। निरीक्षण के लिए जो राज्य स्तरीय दल बनाया गया था, उसमें शामिल शिक्षकों और अधिकारियों की कुंडली ही इस बात को समझाने के लिए काफी थी। प्रदेश में एक भी कुलसचिव ऐसा नहीं है, जिसके ऊपर भ्रष्टाचार की शिकायत न हो। सभी लोकायुक्त और ईओडब्लू के शिकंजे में हैं। मंत्री से लेकर सारे अधिकारी इनकी काबिलियत से बखूबी वाकिफ हैं। इनके अलावा जिन शिक्षकों को कमान सौंपी गई थी, उनमें से अधिकांश निरीक्षण की रिपोर्ट बनाने के ही एक्सपर्ट थे। कई तो संचालनालय में ही बैठकर अपना हुनर दिखा चुके हैं। प्रारंभिक जांच में आरोप साबित होने के बाद कई के खिलाफ डीई चल रही है। इन सबको भी छोड़ दिया जाए तो सूची में शामिल 80 फीसदी लोग वे थे, जो कालेज में पढ़ाना नहीं चाहते। इनका आधा समय इसी तरह की कमेटियों में जगह बनाने में ही बीतता है। विभाग के अधिकारियों ने भी सरकार की मंशा को बहुत हल्के से लेते हुए अपनी ढयोड़ी पर रोजाना माथा रगड़ने वालों को ही खजाने की चाबी सौंप दी(प्रवीण शर्मा,दैनिक जागरण,मध्यप्रदेश)।
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