पदोन्नति में आरक्षण और वरिष्ठता का लाभ तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक कि 85वें संविधान संशोधन के तहत सरकारें नियम-कानून नहीं बना लेतीं। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका खारिज करते हुए इस फैसले पर मुहर लगा दी।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को भी बहाल रखा है जिसमें राज्य सरकार की 28 दिसंबर 2002 और 25 अप्रैल 2008 की अधिसूचनाओं को असंवैधानिक मानते हुए निरस्त कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने यह आदेश आरएएस अधिकारियों की पदोन्नति के मामले में 5 फरवरी 2010 को दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 19 अक्टूबर, 2006 को एम. नागराज के मामले में संविधान संशोधनों को सही ठहराते हुए कहा था कि सरकार पदोन्नतियों में आरक्षण और वरिष्ठता का लाभ दे सकती है, लेकिन इसके लिए पहले कानून बनाए। यह देखे कि उन सेवाओं या वर्गो में आरक्षित वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं।
इस बात के आंकड़े एकत्रित करे कि क्या वे वाकई पिछड़े हैं और पदोन्नति में आरक्षण से प्रशासनिक कुशलता तो प्रभावित नहीं हो रही है।
इधर, मंगलवार को आरएएस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खबर से प्रशासनिक हल्कों में काफी हलचल रही। आरएएस में सामान्य वर्ग के अधिकारियों ने मुख्य सचिव सलाउद्दीन अहमद और प्रमुख कार्मिक सचिव खेमराज से मिलकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने की मांग की।
इनका कहना था कि इस फैसले से सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग के अधिकारियों को उनकी मूल वरिष्ठता मिलेगी। इसमें किसी का नुकसान नहीं होगा।
आरएएस मामले में अब तक क्या हुआ?
16 दिसंबर, 1999 को इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा पदोन्नति में आरक्षण असंवैधानिक। सरकार 5 साल में नियम बनाकर प्रावधान बदले।
17 जून, 1995 को संविधान संशोधन। पदोन्नति में आरक्षण दिया जा सकता है, बशर्ते किसी सेवा या वर्ग में आरक्षित वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला हो। इसके नियम बनाए जाएं।
1 अप्रैल, 1997 को केन्द्र सरकार ने अधिसूचना जारी की। अगर आरक्षण की वजह से अजा-जजा के कर्मचारी सामान्य वर्ग के कर्मचारियों से ऊपर आ गए हैं तो उनके समकक्ष आने पर सामान्य वर्ग के कर्मचारी अपनी मूल वरिष्ठता प्राप्त कर लेंगे।
26 जून, 2000 को राज्य सरकार ने आरएएस की प्रोविजनल वरिष्ठता सूची जारी की। इसमें सामान्य वर्ग के अधिकारियों को उनकी मूल वरिष्ठता का लाभ दिया गया था।
4 जनवरी, 2002 को फिर 85 वां संविधान संशोधन।
पदोन्नति में आरक्षण और वरिष्ठता का लाभ दिया जा सकता है। सरकारें कानून बनाएं और यह देखें कि आरक्षित वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला है या नहीं। इसे भूतलक्षी प्रभाव 17 जून, 1995 से लागू किया गया।
इन संविधान संशोधनों को पुन: सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। एम. नागराज के मामले में 19 अक्टूबर, 2006 को संविधान संशोधन तो सही ठहराए, लेकिन चार बातें कहीं-
1. सरकार कानून बनाए।
2. यह देखे कि सेवा या वर्ग में पर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं।
3. जिन्हें पदोन्नति में आरक्षण का लाभ दिया जाना है, क्या वे वाकई पिछड़े हैं।
4. पदोन्नति में आरक्षण देने से प्रशासनिक कुशलता तो प्रभावित नहीं हो रही है।
28 दिसंबर 2001 को राज्य सरकार ने अधिसूचना जारी की कि संविधान संशोधन के तहत आरक्षित वर्ग को पदोन्नति में आरक्षण और वरिष्ठता का लाभ दिया जा सकता है। सामान्य वर्ग के 26 जून, 2000 के तहत वरिष्ठता मिली है, वह अक्षुण्ण रहेगी।
27 नवंबर 2003 को फिर नई प्रोविजन वरिष्ठता सूची जारी की। इसमें अजाजजा के अधिकारियों को पुन: सामान्य वर्ग के अफसरों से ऊपर कर दिया गया।
सरकार हठधर्मिता छोड़े :
आरएएस एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष पी पी बिडियासर का कहना है कि बार-बार सुप्रीम कोर्ट के फैसले होने के बाद भी राज्य सरकार हठधर्मिता नहीं छोड़ रही है। आरक्षित वर्ग के लोगों को अवांछित लाभ देने के लिए सामान्य वर्ग के हितों पर कुठाराघात किया जा रहा है। उनके साथ इस तरह का राजनीतिक खिलवाड़ नहीं होना चाहिए।
एक लाख अधिकारी कर्मचारी होंगे प्रभावित
राज्य सरकार इस आदेश को लागू करती है तो पिछले 14 साल के दौरान राज्य सेवाओं में की गई पदोन्नतियां प्रभावित होंगी। आरएएस वरिष्ठता सूचियां नए सिरे से बनानी होंगी। इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति के अधिकारियों की वरिष्ठता ऊपर से नीचे और सामान्य वर्ग के अधिकारियों की वरिष्ठता नीचे से ऊपर आ जाएगी।
इसका असर अन्य सेवाओं के लोगों पर भी पड़ेगा। इससे करीब 1 लाख अधिकारियों, कर्मचारियों के प्रभावित होने की संभावना है। राज्य में करीब 35 आरएएस ऐसे रिटायर हो गए, जो आईएएस नहीं बन पाए। आईएएस में आरएएस कोटे के 62 पद आज भी खाली हैं।
ये थी राज्य सरकार की अधिसूचना
राज्य सरकार ने 28 दिसंबर, 2002 की अधिसूचना में कहा था कि संविधान संशोधन के तहत आरक्षित वर्ग के लोगों को पदोन्नति में आरक्षण और वरिष्ठता का लाभ दिया जा सकता है, परन्तु सामान्य वर्ग के जिन अधिकारियों ने 26 जून, 2000 के आदेश के तहत वरिष्ठता का लाभ ले लिया था, उनकी वरिष्ठता अक्षुण्ण रहेगी। 25 अप्रैल, 2008 को सरकार ने फिर अधिसूचना जारी की।
इसमें उस शर्त को हटा दिया गया कि सामान्य वर्ग के अधिकारियों को 26 जून, 2000 के आदेश से मिला वरिष्ठता का लाभ अक्षुण्ण रहेगा। इन्हें 1982 बैच के आरएएस अधिकारियों और समता आंदोलन समिति की ओर से हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
राज्य सरकार ने सभी स्थानीय निकायों को पत्र लिखकर आगाह किया है कि वे अपने बजट में नए पद सृजित का प्रस्ताव पारित कर नहीं भिजवाएं। किसी प्रकार के नए वाहन खरीदने का प्रस्ताव भी बजट में शामिल नहीं करें।
इसके बावजूद किसी निकाय ने इस तरह के प्रस्ताव बजट में शामिल कर अनुमोदन के लिए भिजवाए तो बजट पारित नहीं किया जाएगा।
विभाग के उप शासन सचिव ने हाल में प्रदेश के सभी निकायों को एक पत्र जारी कर स्पष्ट कहा है कि वे बजट प्रस्ताव तैयार करते समय बिना विभागीय अनुमति के नए पद सृजन करने व किसी प्रकार के नए वाहन खरीदने का प्रस्ताव शामिल नहीं करें।
अगर नए पदों की जरूरत है तो वे राज्य सरकार को इसका विस्तृत ब्यौरा भिजवाएं। अगर सरकार इजाजत देती है तो ही बजट में ऐसे प्रस्तावों को शामिल करें। अन्यथा बजट अनुमोदित करने में अड़चन आ सकती है।
पत्र में यह भी कहा गया कि बजट प्रस्तावों में स्पष्ट लिखें कि कितने पद रिक्त पड़े हैं। कितने पद सृजित करने की जरूरत है। बजट प्रस्तावों में आवश्यक रूप से यह उल्लेख जरूर करें कि निकायों के पास कितने संसाधन हैं और कितने की जरूरत है(दैनिक भास्कर,जयपुर-जोधपुर,8.12.2010)।
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